असम के केन्द्रीय जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह का दल वारिस पंजाब दे इन दिनों चर्चा में है. अमृतपाल सिंह पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की गई है. उन पर अलगाववाद को समर्थन देने का आरोप है. संगठन ने भारत निर्वाचन आयोग में रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया जनवरी में शुरू की. लेकिन इस पर अभी तक फैसला नहीं हो पाया. रजिस्ट्रेशन में देरी की वजह से संगठन ने अदालत का रुख किया है. अदालत ने निर्वाचन आयोग को नोटिस देकर जवाब मांगा है. अब इस मसले पर अगले महीने चार नवंबर को सुनवाई तय है.

आइए, इस ताजे संदर्भ में समझते हैं की आखिर राजनीतिक दल के रजिस्ट्रेशन का पूरा प्रॉसेस क्या है? वारिस पंजाब दे को लेकर कहां फंसा है पेंच?
भारत निर्वाचन आयोग करता है पंजीकरण
भारत में राजनीतिक दल का पंजीकरण निर्वाचन आयोग के पास होता है. इसकी कानूनी बुनियाद लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए है. दल को आयोग में पंजीकरण कराना जरूरी नहीं है, लेकिन पंजीकरण के बिना उसे आयोग में दर्ज राजनीतिक दल का दर्जा और उससे जुड़े लाभ नहीं मिलते. पंजीकृत होने का अर्थ यह नहीं कि दल को तुरंत राज्य या राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता मिल गई. शुरुआत में दल आम तौर पर पंजीकृत, लेकिन अमान्यता प्राप्त पार्टी होता है. चुनाव में उसके प्रदर्शन के आधार पर वह बाद में राज्य या राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता के लिए तय मानदंड पूरा कर सकता है. जानना जरूरी है की पंजीकरण और मान्यता दो अलग प्रक्रियाएं हैं.
भारत में राजनीतिक दल का पंजीकरण निर्वाचन आयोग के पास होता है.
राजनीतिक दल के पंजीकरण के लिए कब किया जाता है आवेदन?
किसी नए दल को गठन के 30 दिनों के भीतर निर्वाचन आयोग में पंजीकरण के लिए आवेदन देना होता है. आवेदन आयोग के निर्धारित प्रारूप में भेजा जाता है. प्रक्रिया में दल का नाम, उसके गठन की तारीख, मुख्यालय और पदाधिकारियों की जानकारी देनी होती है. आवेदन के साथ दल का संविधान या नियमावली भी देनी होती है. उसमें दल के उद्देश्य, सदस्यता, संगठन की बनावट और अलगअलग स्तरों पर पदाधिकारियों के चुनाव की प्रक्रिया साफ लिखी होनी चाहिए. दस्तावेजों में यह भी बताया जाता है कि संगठनात्मक चुनाव कितने समय बाद होंगे और पदाधिकारियों का कार्यकाल क्या होगा.
सांसद अमृतपाल सिंह.
आवेदन के साथ किन दस्तावेजों की जरूरत?
निर्वाचन आयोग के दिशानिर्देशों के अनुसार आवेदन के साथ कई दस्तावेज मांगे जाते हैं. इनमें दल का संविधान, पदाधिकारियों की सूची और दल के गठन से जुड़ी जानकारी शामिल होती है. दल के सदस्यों की जानकारी और मतदाता सूची से जुड़े प्रमाण भी देने पड़ते हैं. आमतौर पर कम से कम सौ सदस्यों के मतदाता होने का प्रमाण देना होता है. दल के अध्यक्ष या महासचिव को यह शपथ देनी होती है कि सदस्यों की जानकारी सही है. सदस्यों के शपथपत्र भी मांगे जाते हैं. इनमें यह पुष्टि की जाती है कि वे निर्वाचन आयोग में पंजीकृत किसी अन्य राजनीतिक दल के सदस्य नहीं हैं.
आवेदन के साथ निर्धारित शुल्क और आयोग द्वारा मांगे गए अन्य प्रमाण भी जमा करने होते हैं. दल के संविधान में यह घोषणा भी शामिल होनी चाहिए कि वह भारत के संविधान, लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और देश की एकता तथा अखंडता के प्रति निष्ठा रखेगा. आयोग दस्तावेजों की जांच करता है. कोई कमी मिलने पर वह अतिरिक्त जानकारी या स्पष्टीकरण मांग सकता है.
क्या है नाम पर आपत्ति की पूरी प्रक्रिया?
आवेदन मिलने के बाद प्रस्तावित दल के नाम को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है. आयोग के दिशा निर्देशों के मुताबिक नाम को अखबारों में प्रकाशित किया जाता है. इससे जनता को प्रस्तावित नाम की जानकारी मिलती है. किसी व्यक्ति या संगठन को नाम पर आपत्ति हो तो वह तय समय में आयोग के सामने अपनी बात रख सकता है. आयोग आपत्तियों और आवेदन के कागजात की जांच करता है. इसके बाद वह पंजीकरण पर फैसला करता है. इसलिए आवेदन जमा होते ही पंजीकरण अपने आप मंजूर नहीं होता. आयोग की जांच और निर्णय जरूरी होते हैं.
पंजीकरण से क्या लाभ मिलता है?
पंजीकरण के बाद दल को निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड में राजनीतिक दल के रूप में जगह मिलती है. चुनाव के दौरान उसके उम्मीदवारों को चुनाव चिह्न आवंटन की प्रक्रिया में कुछ लाभ मिल सकते हैं. लेकिन पंजीकृत, अमान्यता प्राप्त दल को अपने लिए स्थायी आरक्षित चुनाव चिह्न अपने आप नहीं मिलता. राज्य या राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता चुनावी प्रदर्शन से जुड़ी होती है. इसके लिए आयोग के तय वोट और सीटों के मानदंड पूरे करने होते हैं. मान्यता मिलने पर पार्टी को आरक्षित चुनाव चिह्न सहित कुछ विशेष सुविधाएं मिलती हैं.
वारिस पंजाब दे के आवेदन में कहां फंसा है पेंच?
वारिस पंजाब दे ने जनवरी 2025 में निर्वाचन आयोग के पास राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण के लिए आवेदन दिया था. संगठन से जुड़े नेताओं का कहना है कि आवेदन लंबे समय से लंबित है. इस देरी को लेकर मामला अदालत तक पहुंचा है. 1 अक्टूबर 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया और चार हफ्तों में जवाब देने को कहा.
रिपोर्ट में अगली सुनवाई की तारीख 4 नवंबर बताई गई. अदालत ने आयोग से आवेदन पर फैसला करने के लिए समयसीमा तय करने की बात भी कही. यह ध्यान रखना जरूरी है कि नोटिस जारी होना पंजीकरण मंजूर होने के बराबर नहीं है. अंतिम फैसला आयोग की प्रक्रिया और अदालत में आगे होने वाली सुनवाई पर निर्भर करेगा. निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंता का उल्लेख किया गया. उपलब्ध खबर में आयोग की पूरी दलील या आवेदन पर अंतिम आदेश नहीं दिया गया है. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि आवेदन खारिज हो गया है या पंजीकरण निश्चित रूप से मंजूर होगा.
क्या हैं इस विवाद के मुख्य बिंदु?
इस मामले में दो बातें साथसाथ चल रही हैं. एक ओर संगठन पंजीकरण की मांग कर रहा है और देरी को चुनौती दे रहा है. दूसरी ओर निर्वाचन आयोग ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंता का जिक्र किया है. अब अहम सवाल यह है कि आयोग आवेदन पर किन नियमों और तथ्यों के आधार पर फैसला करता है. अदालत यह देख सकती है कि निर्णय में अनावश्यक देरी तो नहीं हुई और आयोग तय समय में अपना रुख स्पष्ट करता है या नहीं. पंजीकरण प्रक्रिया में आयोग को आवेदन की जांच करनी होती है. उसे दस्तावेज, दल का संविधान और नियमों के अनुसार जरूरी शर्तें देखनी होती हैं. यदि कोई आपत्ति या चिंता सामने आती है, तो आयोग को उस पर विचार करना पड़ सकता है.
इस मामले में आगे क्या हैं संभावनाएं?
आयोग आवेदन पर फैसला कर सकता है. वह अतिरिक्त दस्तावेज या स्पष्टीकरण मांग सकता है. वह पंजीकरण मंजूर कर सकता है या कारण बताते हुए आवेदन अस्वीकार कर सकता है. अदालत भी आयोग से तय समय में निर्णय देने को कह सकती है. लेकिन अदालत का नोटिस अपने आप पंजीकरण का आदेश नहीं है. यदि पंजीकरण मिलता है, तब भी पार्टी को तुरंत मान्यता प्राप्त राज्य या राष्ट्रीय दल का दर्जा नहीं मिलेगा. इसके लिए चुनावों में निर्धारित प्रदर्शन जरूरी होगा. इसलिए इस विवाद का पहला पड़ाव पंजीकरण का फैसला है. चुनाव चिह्न और मान्यता से जुड़े सवाल उसके बाद अलग नियमों के तहत तय होंगे.



