
स्वास्थ्य डेस्क: रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली कई चीजों सेहत पर अनजाने में असर डाल सकती हैं। चाय-कॉफी के लिए इस्तेमाल होने वाले डिस्पोजेबल कप, पूजा के दौरान जलाई जाने वाली अगरबत्ती और मच्छरों से बचने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कॉइल या लिक्विड रिपेलेंट इनमें शामिल हैं। इनका इस्तेमाल करते समय कुछ सावधानियां बरतना जरूरी है, खासकर तब जब घर में छोटे बच्चे, बुजुर्ग या सांस संबंधी परेशानी से जूझ रहे लोग हों।
हालांकि, इन तीनों चीजों को सीधे कैंसर का सबसे बड़ा कारण बताना सही नहीं है। इनके संभावित स्वास्थ्य प्रभाव अलग-अलग हैं और जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि किस पदार्थ का इस्तेमाल हो रहा है, कितनी मात्रा में और कितनी देर तक उसके संपर्क में रहा जा रहा है।
1. स्टायरोफोम के कप और डिस्पोजेबल बर्तन
स्टायरोफोम, पॉलीस्टाइरीन नामक प्लास्टिक का एक रूप है, जिसका इस्तेमाल कुछ डिस्पोजेबल कप, प्लेट और पैकेजिंग सामग्री बनाने में किया जाता है। ऐसे कपों में गर्म चाय या कॉफी डालने पर कुछ परिस्थितियों में इनके रासायनिक घटक पेय में पहुंच सकते हैं। यह कितना होगा, इसका संबंध तापमान, संपर्क की अवधि और इस्तेमाल की गई सामग्री से होता है।
स्टायरीन नामक रसायन के लंबे समय तक अधिक संपर्क को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं मौजूद हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि स्टायरोफोम के कप में चाय पीने से सीधे कैंसर हो जाएगा। जोखिम का आकलन वास्तविक संपर्क और उसकी मात्रा के आधार पर किया जाता है।
क्या सावधानी बरतें?
- गर्म पेय के लिए खाद्य पदार्थों के संपर्क हेतु सुरक्षित और उपयुक्त बर्तनों का इस्तेमाल करें।
- ऐसे प्लास्टिक कंटेनर में गर्म चीजें न डालें, जिन पर गर्म खाद्य पदार्थों के इस्तेमाल की अनुमति न हो।
- जहां संभव हो, स्टील या कांच के कप का विकल्प चुन सकते हैं।
- डिस्पोजेबल बर्तनों को बार-बार इस्तेमाल करने से बचें।
2. अगरबत्ती का धुआं और सांस की सेहत
भारत में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान अगरबत्ती जलाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। लेकिन अगरबत्ती जलने पर धुआं और बारीक कण निकलते हैं, जो बंद कमरे में जमा हो सकते हैं। इनके संपर्क से आंखों और गले में जलन, खांसी या सांस लेने में परेशानी हो सकती है। अस्थमा या अन्य श्वसन समस्याओं से पीड़ित लोगों को इससे अधिक परेशानी हो सकती है।
अगरबत्ती के धुएं में कणों के अलावा कार्बन मोनोऑक्साइड और कुछ अन्य प्रदूषक भी मौजूद हो सकते हैं। लगातार या अधिक मात्रा में धुएं के संपर्क को कम करना बेहतर है। हालांकि, यह कहना कि अगरबत्ती का धुआं हर स्थिति में सिगरेट से दोगुना खतरनाक होता है, सही नहीं है। दोनों के प्रभाव की तुलना धुएं की मात्रा, रासायनिक संरचना और संपर्क की अवधि पर निर्भर करती है।
अगरबत्ती जलाते समय इन बातों का ध्यान रखें:
- बंद कमरे में लगातार अगरबत्ती जलाने से बचें।
- उचित वेंटिलेशन रखें, ताकि धुआं कमरे में जमा न हो।
- बच्चों और सांस संबंधी परेशानी वाले लोगों को धुएं से दूर रखें।
- धुएं से खांसी, आंखों में जलन या सांस लेने में परेशानी बढ़े तो इसका इस्तेमाल रोक दें।
सिर्फ किसी उत्पाद पर ‘प्राकृतिक’ या ‘हर्बल’ लिखा होने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि उसे जलाने से निकलने वाला धुआं पूरी तरह सुरक्षित है।
3. मच्छर भगाने वाले कॉइल और लिक्विड रिपेलेंट
मच्छरों से बचने के लिए कई घरों में कॉइल, लिक्विड रिपेलेंट और दूसरे उत्पाद इस्तेमाल किए जाते हैं। इन उत्पादों में अलग-अलग सक्रिय रसायन हो सकते हैं। कॉइल जलाने से धुआं और बारीक कण भी निकलते हैं, जबकि लिक्विड रिपेलेंट का इस्तेमाल उसके निर्देशों के अनुसार करना चाहिए।
गलत तरीके से इस्तेमाल करने या धुएं के लगातार संपर्क में रहने से कुछ लोगों को आंखों या गले में जलन, खांसी और सांस संबंधी परेशानी हो सकती है। छोटे बच्चों और पहले से सांस की समस्या वाले लोगों के आसपास विशेष सावधानी जरूरी है। सुबह सिरदर्द या थकान होने के कई कारण हो सकते हैं; इसे केवल मच्छर भगाने वाले उत्पाद का असर मान लेना उचित नहीं है।
मच्छरों से बचाव के सुरक्षित तरीके:
- मच्छरदानी का इस्तेमाल करें, खासकर बच्चों के सोते समय।
- घर के आसपास जमा पानी हटाएं, क्योंकि वहां मच्छर पनप सकते हैं।
- खिड़कियों और दरवाजों पर मच्छर रोकने वाली जाली लगाएं।
- कॉइल या लिक्विड रिपेलेंट इस्तेमाल करते समय पैक पर दिए गए निर्देशों का पालन करें।
- उत्पाद को बच्चों की पहुंच से दूर रखें और उसे निर्धारित तरीके से ही इस्तेमाल करें।
मच्छरों से बचाव करना भी जरूरी है, क्योंकि कुछ मच्छर डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां फैला सकते हैं।
क्या ये तीनों चीजें कैंसर का सबसे बड़ा कारण हैं?
नहीं, उपलब्ध जानकारी के आधार पर इन तीनों चीजों को कैंसर के सबसे बड़े कारण बताना उचित नहीं है। कैंसर कई प्रकार का होता है और इसके जोखिम में



