
उत्तर प्रदेश में कुछ समय पहले अंधविश्वास से जुड़ा एक हैरान करने वाला मामला सामने आया था। जहरीले कीड़े के काटने से एक युवक की मौत हो गई थी, लेकिन परिवार और कुछ ग्रामीणों ने उसकी मौत को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद उसे दोबारा जिंदा करने के नाम पर कई दिनों तक झाड़-फूंक और कर्मकांड चलता रहा।
मामला अमांपुर थाना क्षेत्र के एक गांव का बताया गया था। घटना की शुरुआत तब हुई जब 26 वर्षीय युवक को किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया। हालत बिगड़ने पर परिजन उसे अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था।
अस्पताल से लौटने के बाद भी परिजन इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे कि युवक की मौत हो चुकी है। उन्हें उम्मीद थी कि किसी तरह उसे दोबारा जिंदा किया जा सकता है। इसी विश्वास के चलते झाड़-फूंक करने वालों की मदद ली गई।
बताया गया कि इसके बाद दूसरे स्थान से एक महिला को बुलाया गया, जिसने मृत युवक को जीवित करने के नाम पर कथित तौर पर कई तरह के कर्मकांड शुरू किए। शव को पानी से भरे गड्ढे में रखे जाने और आसपास ढोल-थाली बजाने जैसी गतिविधियां भी की गईं।
यह पूरा सिलसिला करीब पांच दिनों तक चलता रहा। इस दौरान आसपास के लोग भी वहां जमा होते रहे और युवक के जीवित होने की उम्मीद में कथित कर्मकांड को देखते रहे।
मामला सामने आने के बाद इलाके में अंधविश्वास को लेकर बहस शुरू हो गई। सबसे बड़ा सवाल यही था कि जब अस्पताल में डॉक्टर युवक को मृत घोषित कर चुके थे, तब भी परिवार ने चिकित्सकीय सलाह के बजाय झाड़-फूंक पर भरोसा क्यों किया।
घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि गंभीर स्वास्थ्य स्थिति में समय पर वैज्ञानिक और चिकित्सकीय उपचार कितना जरूरी है। अंधविश्वास के चलते किसी मृत व्यक्ति को वापस जीवित करने की कोशिश न सिर्फ निरर्थक होती है, बल्कि ऐसी परिस्थितियों में परिवार को मानसिक और आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।



