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मरने के बाद भी आपसे बातें करेगा आपका अपना! जानिए AI की इस खौफनाक टेक्नोलॉजी के पीछे का पूरा सच..?

मरने के बाद भी आपसे बातें करेगा आपका अपना! जानिए AI की इस खौफनाक टेक्नोलॉजी के पीछे का पूरा सच..?

सोचिए अगर किसी अपने के गुजर जाने के बाद भी आपके मोबाइल की स्क्रीन पर उनका वीडियो कॉल आने लगे. वे स्क्रीन पर बिल्कुल उसी तरह मुस्कुराएं, उसी जानी-पहचानी आवाज में बात करें, आपकी पुरानी यादों को ताजा करें और आपके नए सवालों का जवाब भी दें. सुनने में यह किसी हॉलीवुड या साइंस फिक्शन फिल्म का सीन लग सकता है, लेकिन आज की आधुनिक दुनिया में यह एक ठोस हकीकत बन चुका है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से अब उन लोगों के भी डिजिटल रूप या ‘AI Avatars’ बनाए जा रहे हैं, जो इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं. इस पूरी तकनीक और बिजनेस को दुनिया भर में ‘Grief Tech’ (दुख से उबरने वाली तकनीक) या ‘Deadbots’ कहा जा रहा है. यह तकनीक जहां एक तरफ गहरे सदमे में डूबे परिजनों को सुकून और सहारा दे रही है, वहीं दूसरी तरफ इंसान की प्राइवेसी, कानूनी अधिकारों, नैतिकता और मानसिक सेहत पर बेहद गंभीर सवाल भी खड़े कर रही है. आइए इस पूरे विषय को बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं….

Grief Tech

AI कंपनियां मृत लोगों के डिजिटल अवतार कैसे तैयार करती हैं?

आज के डिजिटल दौर में जब भी कोई व्यक्ति जीवित रहता है, तो वह जाने-अनजाने में इंटरनेट की दुनिया में अपना एक बहुत बड़ा ‘डिजिटल नक्शा’ छोड़ जाता है. इसे तकनीकी भाषा में डिजिटल फुटप्रिंट (Digital Footprint) कहते हैं. इसमें उस व्यक्ति की तस्वीरें, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब पर अपलोड किए गए वीडियो, वॉट्सएप चैट्स, ईमेल, वॉयस नोट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स शामिल होते हैं. AI कंपनियां इसी पूरे डेटा को जमा करके मृत व्यक्ति का एक रोबोटिक या वर्चुअल रूप तैयार करती हैं. यह पूरी प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन बड़े स्टेप्स में काम करती है:

स्टेप 1: डेटा कलेक्शन (Data Collection)

सबसे पहले परिजन या टेक कंपनियां उस व्यक्ति का हर संभव डेटा जुटाती हैं. इसमें उसके बोलने के ऑडियो रिकॉर्डिंग्स, पुराने वीडियो क्लिप्स, लिखे हुए मैसेज और हाई-क्वालिटी तस्वीरें शामिल होती हैं. जितना ज्यादा डेटा मिलेगा, AI अवतार उतना ही असली और सटीक बनेगा.

स्टेप 2: वॉयस क्लोनिंग और जनरेटिव AI (Voice Cloning & LLM)

डेटा मिलने के बाद एडवांस्ड AI सॉफ्टवेयर उस इंसान की आवाज के पैटर्न को गहराई से समझता है. वह यह देखता है कि व्यक्ति बोलते समय कहां रुकता था, उसकी आवाज का उतार-चढ़ाव कैसा था और वह किन शब्दों का इस्तेमाल ज्यादा करता था. इसके बाद ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ (LLM) को व्यक्ति की पुरानी चैट्स से ट्रेन किया जाता है ताकि AI जब भी कोई जवाब लिखे, तो उसकी भाषा और सोचने का तरीका बिल्कुल उसी व्यक्ति जैसा लगे.

स्टेप 3: 3D अवतार क्रिएशन (3D Avatar Creation)

आखिरी स्टेप में तस्वीरों और वीडियो की मदद से 3D डिजिटल मॉडल तैयार किया जाता है. यह मॉडल स्क्रीन पर दिखने में बिल्कुल असली इंसान जैसा लगता है. जब AI बोलता है, तो इस डिजिटल मॉडल के होंठ और चेहरे के एक्सप्रेशन उसी के हिसाब से हिलते हैं.

सबसे हैरान करने वाली बात: यह AI अवतार सिर्फ पुरानी रिकॉर्ड की गई बातें ही नहीं दोहराता, बल्कि अगर आप उससे कोई बिल्कुल नया सवाल पूछेंगे, तो वह उस मृत इंसान की सोच और स्वभाव के हिसाब से सोचकर नया जवाब भी दे सकता है.

Grief Tech

‘Grief Tech’ क्या है और यह इंडस्ट्री कितनी तेजी से बढ़ रही है?

जब किसी इंसान के किसी बेहद करीबी (जैसे माता-पिता, बच्चा या दोस्त) की मृत्यु हो जाती है, तो वह इंसान बेहद गहरे शोक और डिप्रेशन से गुजरता है. इस दुख (Grief) को कम करने और लोगों को भावनात्मक सहारा देने के नाम पर जो मार्केट खड़ा हुआ है, उसे ही ‘Grief Tech’ कहा जाता है.

आज दुनिया भर में कई ऐसे स्टार्टअप्स और टेक प्लेटफॉर्म्स आ चुके हैं जो यह सर्विस दे रहे हैं और इसका कारोबार अरबों डॉलर तक पहुंच रहा है:

  • StoryFile:
    यह एक बहुत ही अनोखा प्लेटफॉर्म है. यह लोगों के जीवित रहते ही उनके जीवन के अनुभव, यादें और जवाब वीडियो फॉर्मेट में रिकॉर्ड कर लेता है. व्यक्ति के जाने के बाद परिवार वाले स्क्रीन पर उससे कोई भी सवाल पूछ सकते हैं. AI उनके रिकॉर्डेड वीडियो में से सबसे सही जवाब निकालकर स्क्रीन पर प्ले कर देता है.
  • HereAfter AI:
    यह एक वॉयस-बेस्ड ऐप है. इसमें इंसान जीवित रहते अपनी आवाज में अपनी जीवन कहानी रिकॉर्ड करता है. उसके जाने के बाद बच्चे या पोते-पोतियाँ एक ऐप के जरिए उससे बातचीत कर सकते हैं और किस्से सुन सकते हैं.
  • Somnium Space:
    यह मेटावर्स की दुनिया का एक प्लेटफॉर्म है जो ‘Live Forever’ (हमेशा जीवित रहें) नाम के फीचर पर काम कर रहा है. इसमें इंसान के चलने-फिरने, हाथ हिलाने और बोलने के तरीके का पूरा 3D अवतार बना दिया जाता है, जिससे आप वर्चुअल रियलिटी (VR) हेडसेट पहनकर मिल सकते हैं.

लोग अपने खोए हुए प्रियजनों की कमी को पूरा करने के लिए भावनात्मक रूप से कुछ भी खर्च करने को तैयार हो जाते हैं, इसी वजह से यह इंडस्ट्री दुनिया भर में बहुत तेजी से पैर पसार रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ग्लोबल लेवल पर ‘ग्रीफ टेक’ (Grief Tech) और मृत्यु के बाद डिजिटल पहचान सुरक्षित रखने वाला ‘डिजिटल आफ्टरलाइफ’ मार्केट तेजी से बढ़ रहा है. इस पूरे बाजार का कुल वैल्यूएशन लगभग 123 अरब डॉलर से 126 अरब डॉलर (यानी 1,17,36,30,94,50,000 रुपये से ज्यादा) का हो चुका है. इसमें बड़ा हिस्सा डेथ-टेक और डिजिटल लेगेसी बनाने वाली इंडस्ट्री का है. वहीं दूसरी तरफ, तकनीक की मदद से दी जाने वाली पारंपरिक शोक परामर्श (Grief Counseling) सर्विसेज का बाजार करीब 4.03 अरब डॉलर (लगभग 3,84,53,11,14,500 करोड़ रुपये) का है.

Grief Tech

मौत के बाद आपकी आवाज, फोटो और डेटा का असली मालिक कौन है?

यह इस पूरी बहस का सबसे उलझा हुआ, संवेदनशील और कानूनी रूप से पेचीदा हिस्सा है. जब तक हम जीवित रहते हैं, तब तक हमारी फोटो, आवाज और पर्सनल डेटा पर हमारा अपना मालिकाना हक होता है. लेकिन इंसान की मृत्यु के बाद उस डेटा का क्या होगा, इस पर दुनिया के ज्यादातर देशों में कोई साफ कानून नहीं है.

डिजिटल लेगेसी (Digital Legacy) का न होना
जैसे लोग अपनी जमीन, मकान या बैंक बैलेंस के लिए वसीयत (Will) बनाते हैं, वैसे डिजिटल जायदाद के लिए अभी कोई ठोस व्यवस्था नहीं है. ज्यादातर देशों के कानूनों में यह साफ नहीं है कि मौत के बाद किसी व्यक्ति के सोशल मीडिया अकाउंट्स, पर्सनल चैट्स और फोटोज का लीगल मालिक कौन बनेगा.

टेक कंपनियों की अपनी शर्तें
गूगल, मेटा (फेसबुक/इंस्टाग्राम) और एप्पल जैसी बड़ी कंपनियों की नीतियां अलग हैं. वे आमतौर पर मृत व्यक्ति के पासवर्ड या डेटा को उनके परिवार वालों को भी नहीं देतीं. वे सुरक्षा कारणों से उस अकाउंट को बंद कर देती हैं या उसे ‘मेमोरियलाइज्ड’ (यादगार) पेज में बदल देती हैं.

सबसे बड़ा सवाल: सहमति (Consent) का मुद्दा
सोचिए कि अगर कोई व्यक्ति जीते-जी यह बिल्कुल नहीं चाहता था कि उसकी मौत के बाद उसका कोई AI रोबोट बनाया जाए, लेकिन उसके जाने के बाद उसके परिवार वाले या दोस्त उसका AI अवतार बनवा लेते हैं – तो क्या यह सही है? किसी की मर्जी के बिना उसकी आवाज और चेहरे का इस्तेमाल करके AI अवतार बनाना उसकी प्राइवेसी और सम्मान का सीधा हनन माना जा रहा है.

Grief Tech

AI अवतार से बात करना: दुख में राहत या दिमागी सेहत के लिए खतरा?

मनोवैज्ञानिकों (Psychologists) और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर बहुत तीखी बहस छिड़ी हुई है कि क्या मृत प्रियजनों से AI के जरिए बात करना मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद है या नुकसानदेह.

राहत देने वाले पहलू

  • अधूरेपन का अहसास खत्म होना:
    कई बार हादसों या अचानक हुई मौतों में लोग अपने प्रियजनों से आखिरी बार बात भी नहीं कर पाते. ऐसे में AI अवतार से बात करके वे अपनी भावनाएं जाहिर कर पाते हैं, जिससे उन्हें मन का बोझ हल्का महसूस होता है.
  • यादों को संजोकर रखना:
    छोटे बच्चों के लिए, जिन्होंने बहुत कम उम्र में अपने माता-पिता या दादा-दादी को खो दिया है, यह तकनीक उनके पूर्वजों को जानने और उनकी आवाज सुनने का एक माध्यम बन सकती है.

खतरे और मानसिक नुकस

  • सच को स्वीकार न कर पाना:
    मनोविज्ञान के नियम कहते हैं कि इंसान के मानसिक विकास के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह ‘मौत’ के कड़वे सच को स्वीकार करे और अपनी जिंदगी में आगे बढ़े. लेकिन अगर सामने फोन पर वही इंसान रोज बात कर रहा हो, तो दिमाग इस सच को कभी स्वीकार ही नहीं कर पाएगा.
  • डिजिटल लत और आभासी दुनिया में खो जाना:
    लोग असली दुनिया के अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से कट सकते हैं और दिन-रात उस AI अवतार से बात करने के आदी हो सकते हैं. इससे वे बहुत गहरे अवसाद (Depression) और मानसिक भ्रम (Hallucinations) का शिकार हो सकते हैं.
  • गलत बातें बोलने का खतरा:
    AI आखिरकार एक सॉफ्टवेयर है. अगर बातचीत के दौरान वह अवतार कोई अजीब, डरावनी या गलत बात बोल दे, तो इससे परिजनों को ऐसा दिमागी सदमा लग सकता है जिससे उबरना नामुमकिन हो जाए.

इस टेक्नोलॉजी की भविष्य की चुनौतियां

‘Grief Tech’ सिर्फ एक भावुक सर्विस नहीं है, इसके पीछे कई बड़े नैतिक और सामाजिक खतरे छिपे हुए हैं:

  • Commercial Exploitation:
    कई AI कंपनियां लोगों के दुख और लाचारी का फायदा उठाकर उनसे भारी-भरकम सब्सक्रिप्शन फीस वसूल सकती हैं. सोचिए कितना अजीब और दर्दनाक होगा अगर कोई AI अवतार आपसे बात करते-करते बीच में किसी प्रोडक्ट का विज्ञापन (Advt) करने लगे.
  • Deepfake & Cyber Fraud:
    अगर किसी मृत व्यक्ति की आवाज और चेहरे का डेटा गलत हाथों में चला जाए, तो साइबर अपराधी उसका गलत वीडियो बनाकर रिश्तेदारों से पैसे ठग सकते हैं या कोई बड़ा अपराध अंजाम दे सकते हैं.
  • Digital Immortality का डर:
    क्या इंसान को हमेशा के लिए एक रोबोट के रूप में जीवित रखना सही है? कई दार्शनिकों और विचारकों का मानना है कि जीवन और मृत्यु प्रकृति का एक स्वाभाविक चक्र है. तकनीक के जरिए ‘डिजिटल आत्माएं’ बनाना प्रकृति के नियमों से खिलवाड़ करने जैसा है.

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