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यूपी में स्कूलों का सच नहीं दिखा पाएंगे यूट्यूबर्स, ऐसा फैसला क्यों लिया गया?

देशभर में स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था सवालों के घेरे में है. कई राज्यों में यूट्यूबर्स और विपक्षी पार्टियों के स्कूलों में पहुंचने और वहां के वीडियो बनाते हुए, वहां की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाने की घटनाएं भी सामने आई है.उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूल में भी व बाहरी लोगों की एंट्री पर लगी पाबंदी को लेकर भी चर्चा में हैं.

अयोध्या, आजमगढ़ और समेत कई जिलों में बेसिक शिक्षा विभाग ने बिना अनुमति यूट्यूबर्स, सोशल मीडिया से जुड़े लोगों और अन्य बाहरी व्यक्तियों के स्कूल परिसर में प्रवेश, फोटो या वीडियो बनाने पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं. साथ ही यह कहा गया है कि सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना स्कूलों में फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी नहीं कर सकते.

फिलहाल, यूपी में बिना अनुमति यूट्यूबर्स, सोशल मीडिया से जुड़े लोगों और अन्य बाहरी व्यक्तियों के स्कूल परिसर में प्रवेश, फोटो या वीडियो बनाने पर रोक लगाने के निर्देश से पहले स्कूलों के हालात के बारे में समझने की जरूरत है.UDISE+ 202526 के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कुल 2,65,278 स्कूल हैं. इनमें 1,37,103 सरकारी स्कूल हैं.

यूपी के कितने स्कूलों में बिजली की व्यवस्था नहीं है?

  • बिजली की स्थिति देखें तो 1,37,103 सरकारी स्कूलों में से 1,30,146 में बिजली की सुविधा दर्ज है.
  • यानी 6,957 सरकारी स्कूलों में बिजली की सुविधा नहीं .
  • इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि बिजली कनेक्शन वाले सभी स्कूलों में बिजली चालू हालत में नहीं है.
  • सिर्फ 1,28,141 सरकारी स्कूलों में बिजली कार्यात्मक है.
  • यानी करीब 2,005 स्कूल ऐसे हैं जहां बिजली की सुविधा तो दर्ज है, लेकिन वह कार्यात्मक नहीं है.

यूपी के कितने सरकारी स्कूलों में शौचालय की सुविधा नहीं है?

  • 1,37,103 सरकारी स्कूलों में 1,37,077 विद्यालयों में शौचालय की सुविधा .
  • यानी केवल 26 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां शौचालय की सुविधा दर्ज नहीं है.
  • एक अहम अंतर . शौचालय होना और उसका इस्तेमाल करने लायक होना एक बात नहीं .
  • UDISE+ के अनुसार 1,35,763 सरकारी स्कूलों में शौचालय कार्यात्मक हैं.
  • इसका मतलब है कि करीब 1,314 स्कूलों में शौचालय मौजूद हैं, लेकिन वे कार्यात्मक नहीं हैं.

यूपी के कितने सरकारी स्कूलों में हैंडवाश की सुविधा नहीं

  • प्रदेश में कुल 1,37,103 सरकारी स्कूल हैं.
  • 1,35,533 सरकारी स्कूलों में हैंडवॉश की सुविधा है
  • 1,570 सरकारी स्कूलों में हैंडवॉश की सुविधा नहीं है

फिर, यूट्यूबर्स क्यों रोके जा रहे हैं?

सरकार और बेसिक शिक्षा विभाग की दलील है स्कूलों में बारबार पत्रकारों और यूट्यूबरों के आने से बच्चों की सुरक्षा, निजता और पढ़ाई में व्यवधान से जुड़ी है . उनका तर्क यह भी है वहां नाबालिग बच्चे पढ़ते हैं और उनकी तस्वीर या वीडियो बनाने से पहले अनुमति और सुरक्षा के सवाल उठते हैं.

एक तर्क यह भी है कि स्कूल का शैक्षणिक माहौल बनाए रखना. अधिकारियों का कहना है कि बिना अनुमति लगातार वीडियो शूटिंग, इंटरव्यू या सोशल मीडिया कंटेंट बनाने से पढ़ाई प्रभावित हो सकती . आजमगढ़ के आदेश में भी बाहरी लोगों के अनधिकृत प्रवेश को पढ़ाई में व्यवधान और बच्चों की सुरक्षा से जोड़कर देखा गया.

यूट्यूबर्स और विपक्षी पार्टियों का क्या तर्क है?

हालांकि,डिजिटल पत्रकारों और यूट्यूबर्स और विपक्षी पार्टियों का तर्क है किअगर कोई पत्रकार सरकारी स्कूल में बिजली, शौचालय, पानी, मिडडे मील, शिक्षकों की मौजूदगी या दूसरी सार्वजनिक सुविधाओं की स्थिति की रिपोर्टिंग करना चाहता है, तो इस तरह के रोक के चलते, वह इसमें कैसे सफल होगा. इसके लिए सरकार की तरफ से स्कूलों की रिपोर्टिंग करने देने के लिए पारदर्शिता जरूरी है.

डिजिटल पत्रकारों और यूट्यूबर्स और विपक्षी पार्टियों की यह भी दलील है कि सरकारी स्कूलों में खर्च होने वाला पैसा सार्वजनिक धन है और स्कूलों की सुविधाएं सार्वजनिक नीति का विषय हैं. इसलिए सुरक्षा के नाम पर पूरी तरह मीडिया या बाहरी निगरानी को रोक देना और बच्चों की सुरक्षा के लिए नियंत्रित प्रवेश—दोनों एक जैसी बातें नहीं हैं.

अब इस मामले में सरकार के सामने असल चुनौती क्या?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अनुमति की व्यवस्था पारदर्शी होगी? अगर पत्रकार या YouTuber को स्कूल की वास्तविक स्थिति दिखानी है, तो उसे किस अधिकारी से अनुमति लेनी होगी, कितने समय में अनुमति मिलेगी और क्या सभी पत्रकारों के लिए समान नियम होंगे. अगर देर से अनुमति मिल भी गई है, तो खराब हालात के स्कूलों में प्रशासन अस्थाई व्यवस्था बनाकर, क्या आंखों में धूल झोंकने का काम नहीं कर सकता है?

उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के पास डिजिटल मीडिया के लिए अलग नीति और संबंधित फॉर्म मौजूद हैं.हालांकि, सरकार की बच्चों की निजता और पढ़ाई में बाधाओं की चिंता भी वाजिब है. ऐसेस्कूल परिसर में प्रवेश और बच्चों की फोटो/वीडियो के लिए शिक्षा विभाग की स्थानीय अनुमति व्यवस्था भी महत्वपूर्ण हो जाती .

ऐसे में बहस सिर्फ इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि यूट्यूबर या पत्रकार स्कूल में जा सकता है या नहीं. असली सवाल यह है कि सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत की स्वतंत्र और जिम्मेदार रिपोर्टिंग कैसे हो?बच्चों की सुरक्षा और निजता की रक्षा जरूरी है, लेकिन उसी के साथ सरकारी स्कूलों में सार्वजनिक सुविधाओं की निगरानी और जवाबदेही भी जरूरी. ऐसे में इसके लिए सरकार की तरफ से कोई वैकल्पिक व्यवस्था जरूर लानी होगी.

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