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Heatwave: भारत में 50 डिग्री आम बात, फिर यूरोप में 40 डिग्री पर मौतों से कोहराम क्यों?

यूरोप के कई देश इन दिनों हीटवेव से अस्तव्यस्त हैं. पारा 40 डिग्री पार कर गया है. लगातार मौतें दर्ज हो रही हैं. जबकि भारत में 50 डिग्री तक तापमान पहुंचने का रिकार्ड अक्सर देखने को मिलता है. 40 से 45 डिग्री तो आम बात है. 1300 मौतों का दावा किया गया है. दुनिया सवाल पूछ रही है कि हीटवेव में ये किस तरह का अंतर है और क्यों? आइए, यूरोप में चल रही प्रचंड हीटवेव के बहाने इस मुद्दे को समझने का प्रयास करते हैं.

Heatwave: भारत में 50 डिग्री आम बात, फिर यूरोप में 40 डिग्री पर मौतों से कोहराम क्यों?

इस मुद्दे को समझने के लिए सबसे पहले कुछ आंकड़े देखना जरूरी है. यूरोपीय देश स्पेन में इस साल जून में सर्वाधिक तापमान 45.1 डिग्री दर्ज हुआ. फ्रांस में यह आंकड़ा 44.3 डिग्री रहा. चेक रिपब्लिक में अधिकतम तापमान 41.9, जर्मनी में 41.7 और स्विट्जरलैंड में 40.8 डिग्री दर्ज हुआ. पांच साल पहले यानी जून 2021 में इन्हीं देशों का आंकड़ा देखने से तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट हो जाती है. स्पेन में जून 2021 में औसत तापमान 23.6, फ्रांस में 20.3, जर्मनी में 19, चेक गणराज्य में 18.8 और स्विट्जरलैंड का तापमान 16.5 दर्ज किया गया था. भारत में साल 2021 और 2026 के तापमान में कोई खास फर्क नहीं आया है.

आदत और अनुकूलन में जमीनआसमान का अंतर

लोग जो लंबे समय से गर्मी में रहते हैं, वे कुछ हद तक गर्मी सहन कर लेते हैं. भारत में अधिक लोग गर्म मौसम में काम और जीवन नेचर के अनुरूप ढल चुके हैं. यूरोप में लोग आमतौर पर ठंडे मौसम के आदी हैं. यहां जब अचानक तापमान 4042 डिग्री हुआ तो लोग बिलबिला उठे. यहां रहने वाले लोगों का शरीर और समाज दोनों नए तापमान के लिए तैयार नहीं थे. उन्हें नए तापमान के अनुकूल खुद को ढालने का समय भी नहीं मिला, इसलिए बीमारी और मौतें सामने आ रही हैं.

यूरोप में लोग आमतौर पर ठंडे मौसम के आदी हैं, यह भी एक बड़ी वजह है. फोटो: Getty Images

यहां ठंड से निपटने के लिए बने हैं घर

भारत में गर्मी के बावजूद बड़ी संख्या अभी भी एयर कंडीशनर के बिना ही रहते हैं. गांवों में घर खुले हैं. छप्पर के हैं. यहां वेंटिलेशन सहज मिलता है. यूरोप में ऐसा नहीं है. यहां के कई घर ठोस दीवारों और कांच वाली खिड़कियों के होते हैं. ठंड रोकने के लिए बने हैं. इन खिड़कियों, दीवारों में गर्मी फंस जाती है. एसी या कोई भी ठंडी बढ़ाने वाला यंत्र यहां उपयोग में नहीं है. तापमान अचानक बढ़ने की वजह से रात में भी घर गरम रहते हैं. इससे लोगों को आराम नहीं मिलता. बड़ी संख्या में इन वजहों से लोग बीमार हो रहे हैं.

यूरोपीय देशों में घर ठोस दीवारों और कांच वाली खिड़कियों वाले हैं, जो ठंड को रोकने के लिए हैं, गर्मी के लिए नहीं. फोटो: Getty Images

उम्र और स्वास्थ्य की स्थिति का भी योगदान

यूरोप की आबादी औसतन ज्यादा बूढ़ी है. बुजुर्गों में हार्ट और फेफड़ों की बीमारी आम है. गर्मी में शरीर का तापमान नियंत्रित करना कठिन हो जाता है. इसलिए मृत्यु दर बढ़ती है. भारत की आबादी अपेक्षाकृत युवा है. इससे कुल मृत्यु दर में अंतर दिखाई देता है. पर, इसका मतलब यह नहीं कि भारत में गर्मी से सब सुरक्षित हैं. यहां भी कमजोर लोग मरते हैं. पर, संख्या में फर्क दिखता है. कई बार तो आँकड़े दर्ज ही नहीं हो पाते.

रात की गर्मी और लंबा दिन बन रहा जानलेवा

लंबा दिन और साफ आकाश दिन के तापमान को बढ़ाते हैं. सीधा सूर्य ज्यादा ऊर्जा देता है. साफ मौसम में सूरज की किरणें बिना बाधा ज़मीन और इमारतों को गरम कर देती हैं. रात में आमतौर पर साफ आकाश के साथ गर्मी ऊपर की ओर रेडिएट होकर चली जाती है. पर यह तभी होता है जब हवा और वातावरण ऐसे हों. कई हीटवेव में एक मजबूत उच्च दाब प्रणाली बन जाती है. यह बादल और बारिश को रोकती है. हवा कम चलती है. गर्मी नीचे ही फंसी रहती है. नतीजा यह होता है कि रातें भी गरम ही रहती हैं.

यूरोप के कई हिस्सों में कुछ ही वर्षों में कई रिकॉर्ड तोड़ने वाली हीटवेव आई हैं. फोटो: Getty Images

गर्मी में उमस का भी योगदान

किसी जगह की गर्मी की तकलीफ़ सिर्फ तापमान से नहीं, बल्कि तापमान और नमी दोनों से बनती है. अधिक नमी में पसीना सूखता नहीं. शरीर की कूलिंग बंद हो जाती है. भारत में कई बार तापमान कम लगने पर भी ऊंची नमी से हालत खराब होते हुए देखा जाता है. यूरोप में कड़ी गर्मी अक्सर सूखी ही रहती है. पर जब रातें ठंडी नहीं होतीं तो शरीर को आराम नहीं मिल पाता. यह दोनों स्थितियां खतरनाक हैं.

अनपेक्षित मौसम और चेतावनी प्रणाली

यूरोप के कई हिस्सों में कुछ ही वर्षों में कई रिकॉर्ड तोड़ने वाली हीटवेव आई हैं. प्रशासन और लोग कभी कभी अचानक हुए दौर के लिए तैयार नहीं रहते. चेतावनी और सार्वजनिक कूलिंग सेंटर्स कम हैं. भारत में भी चेतावनी प्रणाली में सुधार की ज़रूरत है. पर, लगातार मिल रहे अनुभव की वजह से कुछ तैयारियाँ बढ़ाई गई हैं. बड़े शहरों में कंक्रीट और काले सर्फेस गर्मी को सोख लेते हैं. बाद में वे गर्मी छोड़ते हैं. रात में शहरों की गर्मी गिरती नहीं. यूरोप के शहर भी इससे प्रभावित हैं. पर यूरोप में कई इमारतें और सड़कें गर्मी फँसा देती हैं, और शहरी हरित क्षेत्र कम होने पर रात में भी राहत नहीं मिलती है.

यूरोप में तापमान रिकॉर्ड बन रहा है. फोटो: Getty Images

रिकॉर्ड और रिपोर्टिंग का फर्क

कई बार मौतों की गिनती और कारण बताने के तरीके अलग होते हैं. यूरोप में गर्मी से संबंधित मौतें स्पष्ट दर्ज होती हैं. भारत में कुछ मौतें सीधे गर्मी को कारण नहीं बतातीं. इसलिए आंकड़े और तुलना सटीक नहीं हो सकती.

क्या लंबी रोशनी और साफ मौसम ज्यादा जिम्मेदार?

यूरोप में ये दोनों कारक मदद करते हैं. पर अकेले नहीं. लंबा दिन और साफ मौसम दिन के ताप को बढ़ाते हैं. पर अगर रात में मौसम नम हो जाता है तो राहत मिलती है. नहीं तो समस्या खड़ी हो जाती है. यही स्थिति तब बनती है जब हवा नहीं चलती, बादल नहीं बनते और उच्च दबाव बना रहता है. ये मिलकर ही जानलेवा बन जाते हैं.

यूरोप के कई हिस्सों में कुछ ही वर्षों में कई रिकॉर्ड तोड़ने वाली हीटवेव आई हैं. फोटो: Getty Images

यूरोप हो या भारत, बचाव के यही हैं उपाय

  • खूब पानी पिएं. छोटेछोटे घूंट लें
  • दोपहर के समय बाहर न जाएं
  • सुबह सुबह या शाम में काम करें
  • हल्का और ढीला कपड़ा पहनें
  • घर में पंखा और छाया का उपयोग बढ़ाएं
  • बुजुर्गों और बच्चों पर खास नजर रखें
  • ताज़ा खाना खाएं, ज्यादा भारी भोजन से बचें

लंबा दिन और साफ मौसम दिन के ताप को बढ़ाते हैं. फोटो: Getty Images

यूरोप के देशों को करनी होगी मजबूत तैयारी

  • चेतावनी प्रणाली तेज़ और सटीक चाहिए.
  • सार्वजनिक कूलिंग सेंटर्स और पानी की व्यवस्था बढ़ाएं.
  • हरित क्षेत्र और पेड़ लगाने पर जोर रखें, यह शहरों की रात की गर्मी कम करता है.
  • भवनों के डिज़ाइन में थर्मल कूलिंग को शामिल करें.
  • छतों पर रिफ्लेक्टिव कोटिंग और ग्रीन रूफ मदद करते हैं.

सरल शब्दों में कहें तो मामला 50 डिग्री या 40 डिग्री का नहीं है. फर्क तैयारी में हैं. आदत और सामाजिक व भौतिक संरचना में है. यूरोप में पांच साल पहले आज का आधा तापमान के साथ जीता था. अचानक आई गर्मी ने नुकसान पहुंचाया है. इसके लिए यूरोप तैयार नहीं था लेकिन अब उसे तेज बदलाव करने होंगे. भारत में भी बहुत नुकसान होता है, पर वजहें अलग अलग होती हैं. लंबा दिन और साफ मौसम असर बढ़ाते हैं. तैयारी और सरल सावधानियां बड़ी मदद कर सकती हैं.

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