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​BRICS: क्या ब्रिक्स का बैंक खत्म करेगा IMF की बादशाहत, भारत को कितना फायदा?

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में चल रहा है. रूसी राष्ट्रपति पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत सदस्य देशों के राष्ट्र प्रमुख और उनके प्रतिनिधि नई दिल्ली में मौजूद हैं. सम्मेलन 13 सितंबर तक चलेगा. शिखर सम्मेलन की वजह से न्यू डेवलपमेंट बैंक चर्चा में है. आइए, इसी बहाने जानते हैं कि क्या है न्यू डेवलपमेंट बैंक, ब्रिक्स सदस्यों को इससे क्या फायदा मिलता है? भारत को कितनी राहत देता है? यह आईएमएफ से कितना अलग?

न्यू डेवलपमेंट बैंक ब्रिक्स देशों ने मिलकर बनाया है. ब्रिक्स का अर्थ है ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका. इसकी स्थापना वर्ष 2015 में हुई थी. इसका मुख्यालय चीन के शंघाई शहर में है. बैंक का उद्देश्य विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे और सतत विकास से जुड़ी परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देना है. सड़क, रेलवे, बंदरगाह, बिजली, जल प्रबंधन, डिजिटल नेटवर्क और स्वच्छ ऊर्जा जैसी परियोजनाएं इसके दायरे में आती हैं. बैंक पर्यावरण संरक्षण और कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देता है.

न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना क्यों हुई?

विश्व बैंक और आईएमएफ जैसे संस्थानों में पश्चिमी देशों का प्रभाव लंबे समय से अधिक रहा है. विकासशील देशों का मानना था कि इन संस्थानों में उनकी आर्थिक ताकत और जनसंख्या के अनुपात में उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता. ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्थाएं तेजी से बढ़ रही थीं. फिर भी उन्हें कई बार विकास परियोजनाओं के लिए महंगे कर्ज पर निर्भर रहना पड़ता था.

न्यू डेवलपमेंट बैंक का मुख्यालय चीन के शंघाई शहर में है.

न्यू डेवलपमेंट बैंक का गठन इस स्थिति को बदलने की कोशिश थी. इसका उद्देश्य किसी पुराने संस्थान को समाप्त करना नहीं है. बल्कि यह विकासशील देशों के लिए एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध कराता है. न्यू डेवलपमेंट बैंक अपने सदस्यों को परियोजना आधारित ऋण देता है. यह ऋण सामान्य रूप से लंबी अवधि के लिए होता है. बैंक स्थानीय मुद्रा में वित्तीय सहायता देने की दिशा में भी काम करता है. इससे विदेशी मुद्रा के जोखिम को कम किया जा सकता है.

भारत को न्यू डेवलपमेंट बैंक से क्या फायदा मिलता है?

भारत न्यू डेवलपमेंट बैंक का संस्थापक सदस्य है. इसलिए भारत की बैंक में महत्वपूर्ण भूमिका है. भारत को न्यू डेवलपमेंट बैंक से कई क्षेत्रों में लाभ मिल सकता है. मिल भी रहा है.

  • बुनियादी ढांचे के लिए वित्त: भारत को सड़क, रेल, मेट्रो, बंदरगाह और जल प्रबंधन के क्षेत्र में बड़े निवेश की जरूरत है. इन परियोजनाओं के लिए भारी पूंजी चाहिए. इससे सरकार और सार्वजनिक संस्थानों पर तत्काल वित्तीय दबाव कुछ कम हो सकता है.
  • स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा: भारत ने सौर और पवन ऊर्जा के विस्तार पर जोर दिया है. देश को कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए बड़े निवेश की जरूरत है. इससे सौर पार्क, ऊर्जा भंडारण, बिजली ग्रिड और हरित परिवहन को बढ़ावा मिल सकता है.
  • शहरी विकास: भारत के शहरों में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है. शहरों को बेहतर सार्वजनिक परिवहन, सीवरेज, जल आपूर्ति और कचरा प्रबंधन की जरूरत है. न्यू डेवलपमेंट बैंक से मिलने वाला वित्त इन क्षेत्रों में उपयोग किया जा सकता है.
  • विदेशी मुद्रा जोखिम में कमी: भारत के लिए डॉलर में लिया गया कर्ज महंगा हो सकता है. यदि रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले गिरती है, तो कर्ज चुकाने का बोझ बढ़ जाता है. स्थानीय मुद्रा में वित्तीय सहायता मिलने से यह जोखिम कम हो सकता है. हालांकि स्थानीय मुद्रा में कर्ज देने की क्षमता और उपलब्धता परियोजना पर निर्भर करती है.
  • वित्तीय स्वतंत्रता: न्यू डेवलपमेंट बैंक भारत को वित्तीय स्वतंत्रता का एक अतिरिक्त रास्ता देता है. भारत अपनी परियोजनाओं के लिए अलगअलग संस्थानों से धन जुटा सकता है. इससे बातचीत की स्थिति मजबूत होती है. भारत को अपनी जरूरतों के अनुसार वित्तीय विकल्प चुनने का अवसर मिलता है.

न्यू डेवलपमेंट बैंक से ब्रिक्स देशों को विकास परियोजनाओं के लिए कर्ज मिलता है.

न्यू डेवलपमेंट बैंक और IMF में अंतर क्या है?

न्यू डेवलपमेंट बैंक और आईएमएफ दोनों अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान हैं. लेकिन दोनों का काम अलग है.

  • आईएमएफ का मुख्य उद्देश्य देशों को आर्थिक और वित्तीय संकट से बाहर निकालना है. जब किसी देश के पास विदेशी मुद्रा की कमी हो जाती है या वह अपने बाहरी भुगतान नहीं कर पाता, तब आईएमएफ सहायता दे सकता है. न्यू डेवलपमेंट बैंक का मुख्य उद्देश्य विकास परियोजनाओं को वित्त देना है. यह सड़क, बिजली, रेलवे, जल और स्वच्छ ऊर्जा जैसी परियोजनाओं पर ध्यान देता है.
  • IMF आमतौर पर आर्थिक स्थिरता पर जोर देता है. वह कर्ज लेने वाले देश से बजट घाटा कम करने, सब्सिडी में बदलाव करने या आर्थिक सुधार लागू करने को कह सकता है.न्यू डेवलपमेंट बैंक का ध्यान परियोजना आधारित विकास पर रहता है. इसकी शर्तें सामान्य रूप से किसी देश की व्यापक आर्थिक नीतियों के बजाय संबंधित परियोजना पर केंद्रित होती हैं.
  • आईएमएफ का प्रभाव वैश्विक स्तर पर है. इसमें दुनिया के अनेक देश सदस्य हैं. न्यू डेवलपमेंट बैंक की शुरुआत ब्रिक्स देशों ने की थी. बाद में इसके सदस्य देशों का विस्तार हुआ. आईएमएफ में मतदान शक्ति का ढांचा लंबे समय से विकसित देशों को अधिक प्रभाव देता है. न्यू डेवलपमेंट बैंक में संस्थापक ब्रिक्स देशों की भूमिका अधिक संतुलित है.

In 2018, NDB approved USD 300M to DBSA for South Africa’s renewable energy sector. Impact: 15 subprojects, 4 provinces, 1,147 MW added, plus new jobs and small business growth.

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— New Development Bank September 4, 2026

क्या यह IMF का विकल्प हो सकता है?

न्यू डेवलपमेंट बैंक को आईएमएफ का सीधा विकल्प नहीं कहा जा सकता. दोनों संस्थानों के उद्देश्य अलग हैं. आईएमएफ आर्थिक संकट के समय मदद करता है. न्यू डेवलपमेंट बैंक विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराता है. किसी देश को विदेशी मुद्रा संकट हो, तो न्यू डेवलपमेंट बैंक शायद आईएमएफ जैसी भूमिका नहीं निभा सके. दूसरी ओर, लंबी अवधि की सड़क, ऊर्जा या शहरी परियोजनाओं के लिए न्यू डेवलपमेंट बैंक उपयोगी हो सकता है. दोनों संस्थान एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं. एक संस्था आर्थिक स्थिरता में मदद करती है. दूसरी विकास परियोजनाओं को गति दे सकती है.

न्यू डेवलपमेंट बैंक के सामने क्या हैं चुनौतियां?

न्यू डेवलपमेंट बैंक के सामने कई चुनौतियां भी हैं. इसे अपनी ऋण देने की क्षमता बढ़ानी होगी. परियोजनाओं की मंजूरी और क्रियान्वयन में पारदर्शिता बनाए रखना भी जरूरी है. बैंक को राजनीतिक मतभेदों से दूर रहना होगा. सदस्य देशों के बीच तनाव का असर बैंक के काम पर नहीं पड़ना चाहिए. स्थानीय मुद्रा में ऋण देने की व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा. इससे डॉलर पर निर्भरता कम होगी. इसके अलावा, परियोजनाओं का पर्यावरण और समाज पर प्रभाव भी ध्यान में रखना होगा. विकास के नाम पर विस्थापन और प्रदूषण नहीं बढ़ना चाहिए.

न्यू डेवलपमेंट बैंक पूंजी कैसे जुटाता है?

बैंक की शुरुआती अधिकृत पूंजी 100 अरब डॉलर थी. इसमें से 50 अरब डॉलर की पूंजी संस्थापक पांच देशों ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने बराबर 1010 अरब डॉलर का योगदान तय किया. बाकी 50 अरब डॉलर जरूरत पड़ने पर बैंक सदस्य देशों से ले सकता है. पांचों देशों की हिस्सेदारी बराबर रखी गई थी.

बैंक केवल सदस्य देशों के योगदान पर निर्भर नहीं रहता. इसका मुख्य मॉडल अपनी पूंजी और सदस्य देशों की गारंटी के आधार पर अच्छी क्रेडिट रेटिंग हासिल करना. अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बॉन्ड जारी करना. इन बॉन्ड से जुटाई गई रकम को सदस्य देशों की बुनियादी ढांचा और सतत विकास परियोजनाओं में ऋण के रूप में लगाना.

ऋण से मिलने वाले ब्याज और मूलधन की वापसी से आगे की परियोजनाओं को वित्त देना. बैंक के अनुसार, उसका सामान्य वार्षिक फंडिंग कार्यक्रम लगभग 5 से 6 अरब डॉलर के बराबर रहने की उम्मीद है. वास्तविक राशि बाजार की स्थिति, निवेशकों की मांग और बैंक की जरूरत पर निर्भर करती है. बैंक ने 31 दिसंबर 2025 तक लगभग 42.9 अरब डॉलर लोन मंजूर किया है.

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