
कल्पना कीजिए कि आप सड़क किनारे किसी दुकान पर रुकते हैं। सामने फल और सब्जियां रखी हैं, हर सामान की कीमत भी लिखी है, लेकिन दुकान पर न कोई दुकानदार है और न कोई कैशियर। आसपास कोई CCTV कैमरा भी नजर नहीं आता। आप अपनी पसंद का सामान उठाते हैं, उसकी कीमत का हिसाब लगाते हैं और पैसे एक डिब्बे में डालकर वहां से चले जाते हैं।
भारत में यह सिर्फ कल्पना नहीं, बल्कि एक जगह की पुरानी परंपरा है।
उत्तर-पूर्वी भारत के मिजोरम में कई जगह सड़क किनारे ऐसी दुकानें देखने को मिलती हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘नघाह लोह डॉर’ कहा जाता है। इसका मतलब है ऐसी दुकान जहां कोई दुकानदार मौजूद नहीं होता।
सुबह किसान अपने खेतों से ताजे फल और सब्जियां लेकर आते हैं और उन्हें सड़क किनारे सजा देते हैं। हर सामान के सामने उसकी कीमत लिखी होती है। इसके बाद किसान वापस अपने खेतों में काम करने चले जाते हैं।
अब आगे की जिम्मेदारी ग्राहक की होती है।
जिसे जो सामान चाहिए, वह खुद उठाता है और उसकी तय कीमत एक छोटे से बॉक्स में डाल देता है। किसी को हिसाब बताने वाला नहीं होता, कोई बिल काटने वाला नहीं होता और सामान की निगरानी के लिए कोई कर्मचारी भी नहीं बैठता।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि लोगों के बीच इस व्यवस्था को लेकर इतना भरोसा है कि दुकान खाली छोड़ने के बावजूद किसान निश्चिंत होकर अपना काम करते हैं।
कई जगह ये दुकानें लंबे समय तक खुली रहती हैं। स्थानीय स्तर पर ऐसी दुकानों को ईमानदारी और आपसी विश्वास की मिसाल के तौर पर देखा जाता है। दावा किया जाता है कि यहां सामान लेकर बिना पैसे दिए चले जाने या रखे हुए पैसे चोरी होने जैसी घटनाएं बेहद दुर्लभ हैं। कई बार ग्राहक तय कीमत से ज्यादा पैसे भी छोड़ जाते हैं।
समय बदला तो भुगतान का तरीका भी बदल गया। पहले इन दुकानों पर सिर्फ कैश बॉक्स हुआ करता था, लेकिन अब कई जगहों पर डिजिटल भुगतान की सुविधा भी उपलब्ध है। ग्राहक सामान लेने के बाद QR कोड स्कैन करके पैसे सीधे ऑनलाइन भेज सकते हैं।
यानी दुकान का तरीका आधुनिक हो गया, लेकिन उसके पीछे मौजूद भरोसा आज भी वही है।
जहां आम दुकानों में सामान की सुरक्षा के लिए ताले, कैमरे और कर्मचारियों की जरूरत पड़ती है, वहीं मिजोरम की ये छोटी-छोटी दुकानें लोगों के भरोसे पर चलती हैं। किसान अपना सामान वहां छोड़कर चले जाते हैं और उन्हें उम्मीद रहती है कि ग्राहक ईमानदारी से सामान की कीमत चुका कर ही जाएंगे।
यही वजह है कि बिना दुकानदार की ये दुकानें सिर्फ फल और सब्जियां बेचने की जगह नहीं रह गई हैं। ये उस सामाजिक भरोसे की कहानी बन गई हैं, जहां लोगों की ईमानदारी ही दुकान की सबसे बड़ी सुरक्षा है।



