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फिल्मों में रोने वाले सीन असली होते हैं या एक्टिंग का कमाल? हिमानी शिवपुरी से जानें पर्दे के पीछे का सच

Satya Report: सिनेमा का सिस्टम: फिल्मों में जब कोई इमोशनल सीन आता है और कलाकार की आंखों से आंसू बहते नजर आते हैं, तो अक्सर दर्शकों के मन में सवाल उठता है कि क्या ये आंसू सच में होते हैं या सिर्फ एक्टिंग का हिस्सा।

फिल्मों में रोने वाले सीन असली होते हैं या एक्टिंग का कमाल? हिमानी शिवपुरी से जानें पर्दे के पीछे का सच
फिल्मों में रोने वाले सीन असली होते हैं या एक्टिंग का कमाल? हिमानी शिवपुरी से जानें पर्दे के पीछे का सच

सच यह है कि कई बार कलाकार अपने किरदार में इतने डूब जाते हैं कि भावनाएं असली लगने लगती हैं और उनकी आंखों से सचमुच आंसू निकल आते हैं। इसे मेथड एक्टिंग या इमोशनल कनेक्शन कहा जाता है। वहीं कई बार ग्लिसरीन का इस्तेमाल करके आंखों में आंसू लाए जाते हैं। ताकि कैमरे पर सीन ज्यादा प्रभावशाली दिखे।

कुछ कलाकार बिना किसी मदद के सिर्फ अपने अभिनय से रो पड़ते हैं, जबकि कुछ जगह तकनीक का सहारा लिया जाता है। यानी फिल्मों में रोने वाले सीन कभी असली भावनाओं का नतीजा होते हैं, तो कभी एक्टिंग और तकनीक का शानदार मेल। इसी मुद्दे पर जनसत्ता.कॉम के साथ खास बातचीत में मशहूर अभिनेत्री हिमानी शिवपुरी ने बताया कि रोने के सीन कैसे शूट होते हैं।

  • फिल्मों में रोने वाले सीन असली होते हैं या एक्टिंग का कमाल?

इस सवाल पर हिमानी शिवपुरी ने बताया कि रोने वाले सीन एक्टिंग का कमाल तो होता ही है, क्योंकि किरदार उस सिचुएशन में होता है, वहीं कभीकभी ग्लिसरीन की भी मदद लेनी पड़ती है। एक्टिंग भी करनी पड़ती है और महसूस भी करना पड़ता है, तभी वो सीन दर्शकों के दिल को छू पाता है।

क्या दुख को याद करके दुखी होता है कलाकार?

इस सवाल पर हिमानी शिवपुरी ने कहा कि इसमें पूरी तरह एक्टिंग या ग्लिसरीन ही नहीं होती बल्कि अपने दुख को भी याद करके भावुक हो जाते हैं। उन्होंने कहा, “इमोशनल मेमोरी होती है, जिसमें आप अपना कोई दुख याद करके रोते हैं। कभी आप अपने को महसूस करते हैं कि आप उस सिचुएशन में हैं और फिर किरदार में इस तरह घुस जाते हैं कि अपने आप ही आंसू निकल जाते हैं।”

ग्लिसरीन लगाना भी हो जाता है जरूरी

उन्होंने बताया कि कभीकभी रीटेक होते हैं और ऐसे में बारबार आंसू निकालना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में ग्लिसरीन की मदद लेनी पड़ती है।

पुराने कलाकारों को भी होती है दिक्कत

क्या मंजे हुए कलाकारों के लिए रोने वाले सीन करना आसान होता है, इस सवाल पर भी हिमानी शिवपुरी ने बताया। उन्होंने कहा, “एक्टिंग में कम समय हो या ज्यादा समय हो, आपको उस सिचुएशन में खुद को महसूस करना पड़ता है।” उन्होंने बताया कि कई बार सेट का माहौल ऐसा होता है कि चाहते हुए भी एक्टर गहराई में नहीं डूब पाता और नकली आंसू निकालने पड़ते हैं, जिसके लिए ग्लिसरीन की मदद लगती है।

हर अभिनेता को रोने का तरीका होता है अलग

अभिनेत्री ने बताया कि हर अभिनेता के रोने का तरीका अलग होता है, ठीक वैसे ही जैसे उनकी एक्टिंग करने का तरीका अलग होता है। जैसे हर इंसान अलग होता है वैसे ही एक्टर का भी रोने का, हंसने का तरीका और डांस करने का तरीका अलग होता है। उन्होंने कहा कुछ लोग नकल भी करते हैं लेकिन वो बात नहीं होती।

मेथड एक्टिंग के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने इसकी पढ़ाई की है उनके लिए ये बहुत मददगार साबित होती है। वहीं जिनको पता नहीं है इसके बारे में वो नेचुरल एक्टिंग कर लेते हैं, लेकिन जो ट्रेन्ड एक्टर होते हैं, जिनको पता है मेथड एक्टिंग क्या होती है, उनके लिए बहुत मदद करती है।

जब उनसे पूछा गया कि लंबे इमोशनल सीन शूट करने के दौरान, बारबार टेक देने के वक्त एक्टर्स कैसे इमोशन बनाए रखते हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा, “दरअसल मैं तो जैसी हूं मुझे तो अपना पहला टेक ही अच्छा लगता है। उसे आप पूरे दिल से करते हैं, लेकिन जब दोबारा करना पड़ता है या बहुत सारे टेक होते हैं तो थोड़ा सा मुश्किल हो जाता है। हालांकि करना तो पड़ता है क्योंकि बाकी लोग भी उस सीन में होते हैं।”

कभीकभी इमोशनल सीन करते हुए सच में रोने लगते हैं एक्टर्स

इसके बारे में बात करते हुए हिमानी ने कहा, “जाहिर है कि ऐसे सीन करते हैं तो कहीं न कहीं ऐसा हो जाता है। कभीकभी आप सीन में ऐसे घुस जाते हैं कि उस स्थिति से बाहर निकलने में थोड़ा सा समय लगता है। लेकिन ये सब प्रैक्टिस की बात होती है।”

हिमानी शिवपुरी बॉलीवुड और टीवी की जानीमानी अभिनेत्री हैं, जिन्होंने 90 के दशक में अपनी अलग पहचान बनाई। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से अभिनय सीखने वाली हिमानी ने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘कुछ कुछ होता है’ और ‘परदेस’ जैसी फिल्मों से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। फिल्मों के अलावा वो टीवी सीरियल में भी नजर आती हैं।

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