वंदे मातरम् भले ही भारत का राष्ट्र गीत है, बावजूद इसके देश में इसे लेकर किसी न किसी रूप में अक्सर विवाद होते रहते हैं. इसी 15 अगस्त को यह विवाद फिर से उभरकर सामने आया, जिसे सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने मुद्दा बना दिया है. वह कांग्रेस पर हमलावर है. आरोप है कि कांग्रेस मुख्यालय में झंडारोहण के समय वन्दे मातरम् बजाए जाने पर सोनिया गांधी ने नाराजगी जताई. आइए, इसी बहाने समझते हैं कि क्या है आनंदमठ की कहानी, जहां से निकला वन्दे मातरम?

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित उपन्यास आनंदमठ भारतीय साहित्य और स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है. यह सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि देशप्रेम, त्याग और राष्ट्रभक्ति की वह जीवंत ज्वाला है, जिसने पूरे भारत को आजादी के महासंग्राम में एक सूत्र में पिरो दिया. इसी उपन्यास के पन्नों से भारत का राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् निकला, जो आगे चलकर क्रांतिकारियों का सबसे बड़ा मंत्र बना.
बंगाल का भयावह अकाल और पृष्ठभूमि
यह कहानी अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध के बंगाल की पृष्ठभूमि पर आधारित है. उस समय बंगाल भीषण अकाल की चपेट में था. बारिश न होने के कारण फसलें पूरी तरह सूख चुकी थीं और खेतों में केवल धूल उड़ रही थी. चारों ओर भुखमरी, तड़प और मौत का तांडव मचा हुआ था. अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी और स्थानीय नवाबों के भ्रष्ट तंत्र को जनता की पीड़ा से कोई सरोकार नहीं था. जनता दानेदाने को मोहताज थी, लेकिन हुकूमत निर्ममता से लगान वसूल रही थी. लोग अपने घरों को छोड़कर पलायन करने लगे थे. गांव के गांव वीरान और श्मशान में तब्दील हो चुके थे.
उपन्यास आनंदमठ भारतीय साहित्य और स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है.
पदचिह्न गांव और एक परिवार की त्रासदी
इसी त्रासदी के बीच पदचिह्न गांव के एक संपन्न जमींदार महेंद्र सिंह और उनकी पत्नी कल्याणी रहते थे. उनके पास एक नन्हीं बेटी थी जिसका नाम सुकुमारी था. जब अकाल का साया उनके गांव तक पहुंचा, तो घर का सारा अन्न समाप्त हो गया. भूख से अपनी मासूम बच्ची को तड़पते देख महेंद्र ने गांव छोड़ने का फैसला किया. वह अपनी पत्नी और बेटी को लेकर पास के शहर की ओर पैदल ही निकल पड़े. रास्ते में जंगल के बीच भूख और प्यास से बेहाल होकर महेंद्र भोजन की तलाश में आगे बढ़े.
इसी दौरान डाकुओं के एक गिरोह ने कल्याणी और सुकुमारी को घेर लिया. कल्याणी अपनी बच्ची की जान बचाने के लिए जंगल के गहरे अंधेरे में भागती रही. उसने अपनी पवित्रता और बच्ची की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना की. तभी जंगल में एक सन्यासी का आगमन हुआ, जिन्होंने कल्याणी और उसकी बच्ची को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया. ये सन्यासी कोई साधारण साधु नहीं, बल्कि संतानों के दल के प्रमुख थे.
आनंदमठ और संतान दल का रहस्य
जंगल के भीतर एक गुप्त और दुर्गम आश्रम था, जिसे आनंदमठ कहा जाता था. इस मठ के संस्थापक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक महात्मा सत्यानंद थे. सत्यानंद ने संन्यासियों का एक ऐसा संगठन बनाया था जो खुद को भारत माता की संतानें कहते थे. ये सन्यासी सांसारिक मोहमाया, परिवार और व्यक्तिगत सुख का पूरी तरह त्याग कर चुके थे. उनका एकमात्र धर्म और उद्देश्य मातृभूमि की सेवा करना और अत्याचारी हुकूमत से जनता को मुक्त कराना था. वे दिन में ईश्वर की आराधना करते थे और रात में तलवार, तीरकमान व बंदूकों से सैन्य अभ्यास करते थे.
वंदे मातरम् का अलौकिक गान
जब महेंद्र अपने परिवार की खोज करते हुए आनंदमठ पहुंचे, तो उनका सामना महात्मा सत्यानंद और उनके प्रमुख शिष्य भवानंद से हुआ. महेंद्र के मन में केवल निराशा और भय था. वह अंग्रेजों और नवाबों की विशाल सेना के सामने खुद को असहाय महसूस कर रहे थे. तभी भवानंद ने महेंद्र को राष्ट्र का वास्तविक स्वरूप समझाने के लिए एक अलौकिक गीत गाना शुरू किया.
वंदे मातरम्!
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्
इस गीत के माध्यम से भवानंद ने समझाया कि मातृभूमि केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं है, बल्कि वह साक्षात जननी और देवी है. जिसके पास करोड़ों संतानों की भुजाओं की शक्ति हो, वह दुर्बल कैसे हो सकती है? इस गान ने महेंद्र के भीतर की कायरता को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया. उनके रोंगटे खड़े हो गए और उनका हृदय राष्ट्रभक्ति के अद्वितीय तेज से भर गया.
भारत माता के तीन स्वरूपों का दर्शन
महात्मा सत्यानंद ने महेंद्र को आनंदमठ के गुप्त कक्षों में ले जाकर मातृभूमि के तीन दिव्य रूपों के दर्शन कराए. यह दृश्य उपन्यास का सबसे प्रभावशाली और दार्शनिक अंश है. सबसे पहले उन्होंने ‘मां जो थीं’ का दर्शन कराया. यह जगद्धात्री की स्वर्णमयी, समृद्ध और अत्यंत वैभवशाली प्रतिमा थी, जो प्राचीन भारत के गौरव, संपन्नता और शक्ति का प्रतीक थी. इसके बाद उन्होंने ‘मां जो बन गई हैं’ का दर्शन कराया. यह मां काली की अंधकारमय, वस्त्रहीन और अस्थिपंजर युक्त प्रतिमा थी.
यह वर्तमान भारत की दुर्दशा, अकाल, पराधीनता और दरिद्रता का प्रतीक थी, जिसने हर संतान की आत्मा को झकझोर कर रख दिया. अंत में सत्यानंद ने ‘मां जो बनेंगी’ का दिव्य दर्शन कराया. यह मां दुर्गा की दस भुजाओं वाली, सभी अस्त्रशस्त्रों से सुसज्जित, शक्तिशाली और विजयी प्रतिमा थी. यह भविष्य के स्वतंत्र, सशक्त और वैभवशाली अखंड भारत का स्वरूप थी. इस दर्शन ने संतानों के भीतर प्राण न्योछावर करने का अटूट संकल्प भर दिया.
त्याग, समर्पण और कल्याणी का बलिदान
महेंद्र ने भी संतान दल में शामिल होने और देश सेवा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने का निर्णय लिया. हालांकि, संतान धर्म का नियम अत्यंत कठोर था. इस मार्ग पर चलने वाले को अपने पारिवारिक मोह का त्याग करना अनिवार्य था. कल्याणी ने जब यह समझा कि उसका और उसकी बेटी का मोह महेंद्र के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन रहा है, तो उसने पति के राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि माना. उसने चुपचाप विष पीकर अपने प्राणों का उत्सर्ग करने का प्रयास किया ताकि महेंद्र पूरी तरह निष्काम भाव से देश सेवा में जुट सकें. यद्यपि बाद में योगबल और औषधियों से कल्याणी का जीवन बचा लिया गया, किंतु इस घटना ने कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की पराकाष्ठा को सिद्ध कर दिया.
संन्यासियों का ऐतिहासिक संग्राम
उपन्यास का अंतिम भाग अंग्रेजी सेना और संन्यासियों के बीच हुए भीषण युद्ध का वर्णन करता है. अंग्रेजी फौज ने आनंदमठ को नष्ट करने और संतानों के विद्रोह को कुचलने के लिए भारी तोपों और बंदूकों के साथ चढ़ाई कर दी. संतानों के पास तोपों की तुलना में सीमित पारंपरिक हथियार थे, लेकिन उनके पास अदम्य साहस और मातृभूमि के लिए प्राण देने का अटूट जुनून था.
सत्यानंद, जीवानंद और भवानंद के नेतृत्व में संतानों ने ‘वंदे मातरम्’ के गगन भेदी उद्घोष के साथ अंग्रेजी सेना पर धावा बोल दिया. युद्धभूमि में संतानों ने असाधारण पराक्रम दिखाया. गोलियों की बौछार के सामने भी उनके कदम पीछे नहीं हटे. भवानंद ने मातृभूमि की वेदी पर लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी. संतानों की प्रचंड वीरता और रणनीति के आगे आधुनिक हथियारों से लैस अंग्रेजी सेना के पैर उखड़ गए और वे पराजित होकर भागने पर मजबूर हो गए.
स्वतंत्रता संग्राम पर आनंदमठ का प्रभाव
आनंदमठ की कहानी केवल एक कालखंड का युद्ध वर्णन नहीं है, बल्कि इसने सोए हुए भारत की राष्ट्रीय चेतना को हमेशा के लिए जगा दिया. बंकिमचंद्र ने इस रचना के माध्यम से मातृभूमि को देवी के रूप में स्थापित किया. 1905 के बंगभंग आंदोलन से लेकर 1947 की आजादी तक, ‘वंदे मातरम्’ हर स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी और सत्याग्रही की जुबान का सबसे पवित्र मंत्र बन गया.
भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय और अरविंद घोष जैसे महान क्रांतिकारियों ने इसी गीत को गाते हुए फांसी के फंदों और लाठियों का हंसतेहंसते सामना किया. आनंदमठ यह अमर संदेश देता है कि जब तक व्यक्ति व्यक्तिगत स्वार्थ और मोह से ऊपर उठकर राष्ट्र को सर्वोपरि नहीं मानता, तब तक कोई भी समाज या देश स्वाधीन और गौरवशाली नहीं बन सकता.



