
नई दिल्ली: गॉल ब्लैडर यानी पित्ताशय में पथरी या दूसरी गंभीर परेशानी होने पर कई मरीजों को इसे निकालने की सलाह दी जाती है। इस सर्जरी को मेडिकल भाषा में कोलेसिस्टेक्टॉमी (Cholecystectomy) कहा जाता है। सर्जरी के बाद ज्यादातर लोग सामान्य जीवन जीते हैं, लेकिन कुछ लोगों को कुछ समय तक ब्लोटिंग, अपच, ढीला मल या तला-भुना खाना खाने के बाद पेट में असहजता जैसी शिकायत हो सकती है।
ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल आता है कि क्या गॉल ब्लैडर निकलवाने से फैटी लिवर का खतरा बढ़ जाता है? विशेषज्ञों के मुताबिक, केवल गॉल ब्लैडर की सर्जरी को फैटी लिवर का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। हालांकि, कुछ शोधों में पित्ताशय हटाने और फैटी लिवर के बीच संभावित संबंध के संकेत जरूर मिले हैं।
गॉल ब्लैडर कब निकाला जाता है?
गॉल ब्लैडर को पित्ताशय भी कहा जाता है। इसमें पित्त यानी बाइल जमा रहता है। गॉल ब्लैडर में पथरी, बार-बार सूजन, पित्त की नली में पथरी फंसना या कुछ अन्य स्थितियों में डॉक्टर सर्जरी की सलाह दे सकते हैं।
हालांकि हर मरीज में गॉल ब्लैडर निकालने की जरूरत नहीं होती। सर्जरी का फैसला बीमारी की गंभीरता, लक्षणों और मरीज की स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर किया जाता है।
गॉल ब्लैडर निकलने के बाद शरीर में क्या बदलता है?
गॉल ब्लैडर खुद बाइल नहीं बनाता। बाइल का निर्माण लिवर करता है और गॉल ब्लैडर इसे जमा करके जरूरत के समय आंत में पहुंचाने में मदद करता है।
खासकर वसा वाला भोजन खाने के दौरान गॉल ब्लैडर सिकुड़कर बाइल को छोटी आंत में छोड़ता है। यह वसा के पाचन और फैट में घुलने वाले विटामिनों के अवशोषण में भूमिका निभाता है।
गॉल ब्लैडर निकाल दिए जाने के बाद भी लिवर बाइल बनाता रहता है। फर्क यह होता है कि बाइल अब गॉल ब्लैडर में जमा नहीं होता और छोटी मात्रा में लगातार आंत तक पहुंचता रहता है।
अधिकांश लोग इस बदलाव के साथ आसानी से सामंजस्य बैठा लेते हैं। हालांकि कुछ लोगों को शुरुआत में खासकर ज्यादा तला-भुना या वसायुक्त भोजन खाने के बाद पाचन संबंधी परेशानी हो सकती है।
क्या गॉल ब्लैडर निकलने के बाद फैट पचाने में परेशानी होती है?
कुछ मरीजों में सर्जरी के बाद भारी या ज्यादा वसायुक्त भोजन पचाने में परेशानी महसूस हो सकती है। इसके कारण ब्लोटिंग, गैस, अपच, पेट में असहजता या ढीला मल जैसी शिकायत हो सकती है।
आमतौर पर शरीर समय के साथ बाइल के नए प्रवाह के अनुसार खुद को ढाल लेता है और ये लक्षण कम हो सकते हैं। हर व्यक्ति में इसका अनुभव अलग हो सकता है।
क्या गॉल ब्लैडर हटाने से फैटी लिवर हो जाता है?
सिर्फ गॉल ब्लैडर की सर्जरी को फैटी लिवर का सीधा कारण नहीं माना जाता।
फैटी लिवर के पीछे आमतौर पर कई मेटाबॉलिक और लाइफस्टाइल से जुड़े कारण होते हैं। इनमें मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई कोलेस्ट्रॉल, असंतुलित खानपान और शारीरिक गतिविधि की कमी प्रमुख हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई जोखिम कारक गॉल ब्लैडर में पथरी और फैटी लिवर दोनों से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए अगर किसी व्यक्ति को सर्जरी के बाद फैटी लिवर का पता चलता है तो यह जरूरी नहीं कि इसकी वजह सर्जरी ही हो।
फिर गॉल ब्लैडर और फैटी लिवर के बीच संबंध की बात क्यों होती है?
वैज्ञानिकों ने बाइल के प्रवाह, गट माइक्रोबायोम और मेटाबॉलिज्म के बीच संबंध पर भी अध्ययन किया है। गॉल ब्लैडर हटने के बाद बाइल के आंत तक पहुंचने का तरीका बदल जाता है। इससे कुछ लोगों में आंतों के बैक्टीरिया के संतुलन में बदलाव हो सकता है।
बाइल एसिड केवल वसा के पाचन में ही भूमिका नहीं निभाते, बल्कि शरीर के मेटाबॉलिज्म से जुड़ी कई प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं। इनमें ग्लूकोज और फैट मेटाबॉलिज्म जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
इसी वजह



