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e-ऑटो या पेट्रोल ऑटो? कमाई से लेकर मेंटेनेंस तक, जानें दोनों में कौन है बेहतर?

ईवी का मार्केट भारत में लगातार बढ़ रहा है. अगर आप इंटरनेट पर ईवी कीवर्ड डालकर कुछ सर्च करने जाएंगे तो आपको पहला या दूसरा इनपुट यही मिलेगा की इस सेक्टर में बूम आ रहा है. डेटा भी बता रहे हैं कि साल 2026 में ही ईवी कारों की डिमांड 3 लाख तक पहुंच सकती है. यह अपने आप में एक बड़ा नंबर है. इसी बीच दिल्ली सरकार ने भी नई ईवी पॉलिसी लाकर सब्सिडी की भरमार कर दी है. ईवी की डिमांड और बिक्री की खबरों की बीच आइए समझते हैं कि ई ऑटो का क्या हाल है. जी हां, ऑटो रिक्शा जो इलेक्ट्रिक चार्जिंग वेस्ड हैं उनके बारे में जानते हैं साथ में यह समझने की कोशिश करेंगे कि ई ऑटो और सामान्य ऑटो जो अमूमन पेट्रोल और सीएनसी से चलता है उसमें बुनियादी अंतर क्या है. मसलन खर्च और मेंटेनेंस के हिसाब से पेट्रोल वाल ऑटो ज्यादा महंगा पड़ेगा या फिर ईऑटो आपको सस्ता और मुफीद पड़ेगा.

e-ऑटो या पेट्रोल ऑटो? कमाई से लेकर मेंटेनेंस तक, जानें दोनों में कौन है बेहतर?

ऑटो चालकों के लिए सबसे बड़ा सवाल रोजाना होने वाली कमाई और बचत का होता है. इस मामले में इलेक्ट्रिक ऑटो पारंपरिक ईंधन से चलने वाले ऑटो की तुलना में काफी किफायती साबित हो सकते हैं. एक ईऑटो को चलाने का खर्च आमतौर पर 50 पैसे से 1.5 रुपये प्रति किलोमीटर के बीच आता है, हालांकि यह बिजली दरों और बैटरी की क्षमता पर निर्भर करता है. यदि कोई चालक रोजाना 100 किलोमीटर वाहन चलाता है तो उसका कुल खर्च लगभग 70 से 150 रुपये तक बैठ सकता है. वहीं पारंपरिक ईंधन वाले ऑटो में यही खर्च 275 से 400 रुपये तक पहुंच सकता है, क्योंकि ईंधन की कीमतों का सीधा असर परिचालन लागत पर पड़ता है. यही वजह है कि ईऑटो चालक हर महीने हजारों रुपये की अतिरिक्त बचत कर सकते हैं, जिससे उनकी वास्तविक कमाई बढ़ जाती है.

मेंटेनेंस में कौन आगे?

मेंटेनेंस के मामले में भी इलेक्ट्रिक ऑटो काफी किफायती साबित होते हैं. इनमें इंजन ऑयल बदलने, क्लच रिपेयर कराने या इंजन ट्यूनिंग जैसी जरूरतें नहीं होती हैं. मैकेनिकल पार्ट्स कम होने के कारण खराबी की संभावना भी कम रहती है और सर्विसिंग पर खर्च सीमित रहता है. दूसरी ओर पारंपरिक ईंधन वाले ऑटो में नियमित रूप से इंजन ऑयल बदलना पड़ता है, फिल्टर बदलने पड़ते हैं और समयसमय पर इंजन की सर्विसिंग भी करानी पड़ती है. इसके चलते इनका रखरखाव खर्च ईऑटो के मुकाबले अधिक होता है. हालांकि, ईऑटो में बैटरी सबसे महत्वपूर्ण और महंगा हिस्सा होती है. कई वर्षों के उपयोग के बाद बैटरी बदलने की जरूरत पड़ सकती है, जिसकी लागत मॉडल और बैटरी प्रकार के अनुसार अलगअलग हो सकती है.

पर्यावरण के लिए कौन बेहतर है?

पर्यावरण के लिहाज से इलेक्ट्रिक ऑटो को बेहतर विकल्प माना जाता है. ईऑटो चलते समय टेलपाइप से किसी तरह का धुआं या प्रदूषण नहीं फैलाते और इनमें शोर भी बेहद कम होता है. इससे शहरों में वायु और ध्वनि प्रदूषण दोनों को कम करने में मदद मिलती है. इसके उलट पारंपरिक ईंधन वाले ऑटो से कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और अन्य प्रदूषक गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण और स्मॉग बढ़ाने में योगदान देती हैं. हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि ईऑटो की बैटरियों के निर्माण और बिजली उत्पादन से अप्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन होता है. इसके बावजूद कुल उत्सर्जन के लिहाज से ईऑटो अधिक पर्यावरण अनुकूल माने जाते हैं.

शुरुआती कीमत में कौन सस्ता पड़ता है?

शुरुआती खरीद कीमत की बात करें तो कई मामलों में पारंपरिक ईंधन वाले ऑटो अभी भी ईऑटो से कुछ सस्ते पड़ते हैं. हालांकि सरकार की सब्सिडी और आसान फाइनेंसिंग विकल्पों के कारण यह अंतर लगातार कम होता जा रहा है. दूसरी तरफ इलेक्ट्रिक ऑटो की शुरुआती कीमत कुछ अधिक जरूर होती है, लेकिन कम ईंधन खर्च और कम मेंटेनेंस के कारण कुछ ही वर्षों में यह अतिरिक्त निवेश वसूल हो सकता है.

चार्जिंग और रीफ्यूलिंग की सुविधा

चार्जिंग और रीफ्यूलिंग दोनों वाहनों के बीच सबसे बड़ा अंतर पैदा करती हैं. इलेक्ट्रिक ऑटो को पूरी तरह चार्ज होने में बैटरी और चार्जर के आधार पर कई घंटे लग सकते हैं और इसके लिए चार्जिंग स्टेशन या चार्जिंग सुविधा की जरूरत होती है. हालांकि शहरों में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बढ़ रहा है. वहीं पारंपरिक ईंधन वाले ऑटो की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इन्हें कुछ ही मिनटों में ईंधन भरवाकर दोबारा सड़क पर उतारा जा सकता है. ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में ईंधन स्टेशन आसानी से उपलब्ध होने के कारण वहां पारंपरिक ऑटो अभी भी ज्यादा सुविधाजनक माने जाते हैं.

यदि आप रोजाना 80 किलोमीटर से ज्यादा गाड़ी चलाते हैं, आपका काम शहर या कस्बों में होता है और आप ईंधन तथा मेंटेनेंस का खर्च कम करना चाहते हैं, तो इलेक्ट्रिक ऑटो आपके लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकता है. वहीं यदि आप ऐसे इलाके में काम करते हैं जहां चार्जिंग सुविधा सीमित है, लंबी दूरी तय करनी पड़ती है या तुरंत रीफ्यूलिंग की जरूरत होती है, तो पारंपरिक ईंधन वाले ऑटो फिलहाल ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बने रहेंगे.

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