
संभल : उत्तर प्रदेश के संभल जिले से ‘सच्चाई की जीत’ और भू-माफियाओं के खिलाफ योगी सरकार के कड़े एक्शन की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने पूरे महकमे में तहलका मचा दिया है। संभल पालिका क्षेत्र के मुरादाबाद मार्ग पर स्थित तख्त गुसाई में ग्राम सभा की करीब 38 बीघा (लगभग अरबों रुपये मूल्य की) बेशकीमती सरकारी जमीन को आखिरकार 59 साल बाद अवैध कब्जे से पूरी तरह मुक्त करा लिया गया है।
जिलाधिकारी (DM) अंकित खंडेलवाल के मुताबिक, इस जमीन का मौजूदा अनुमानित बाजार मूल्य ₹101 करोड़ से अधिक है। इस महा-कार्रवाई को अंजाम देने के लिए उपसंचालक चकबंदी न्यायालय ने महज 25 दिनों के भीतर रोजाना सुनवाई कर ऐतिहासिक फैसला सुनाया और जमीन को दोबारा ग्राम सभा के नाम दर्ज करने का आदेश दिया।
1967 के कथित ‘फर्जी पट्टे’ के खेल से शुरू हुआ था साम्राज्य
इस 59 साल पुराने जमीन घोटाले की जड़ें साल 1967 से जुड़ी हैं। दरअसल, शासन के 11 अगस्त 1954 के गजट के अनुसार, मौजा तख्त गुसाईं को ‘गैर आबाद’ घोषित कर इसका प्रबंधन नगर पालिका संभल को सौंपा गया था, जबकि यह क्षेत्र पालिका की सीमा से पूरी तरह बाहर था।
इसका फायदा उठाते हुए सईदुल रहमान नाम के व्यक्ति ने दावा किया कि 12 जुलाई 1967 को तत्कालीन पालिका अध्यक्ष साहू चिरंजीलाल ने यह जमीन उसे पट्टे पर दी थी। हालांकि, नगर पालिका अधिनियम 1916 के कड़े नियमों के मुताबिक, शासन की लिखित अनुमति के बिना किसी भी सरकारी संपत्ति का पट्टा या अंतरण (Transfer) नहीं किया जा सकता। जांच में सामने आया कि न तो शासन की कोई अनुमति थी और न ही पालिका अध्यक्ष को ऐसा कोई वैधानिक अधिकार था। यह कथित पट्टा पूरी तरह फर्जी, कूटरचित और कानूनी रूप से शून्य (Void) था।
हाईकोर्ट से रिट वापस लेने का खूनी खेल और अफसरों की मिलीभगत
यह मामला कानूनी दांव-पेंचों में इस कदर उलझाया गया था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ‘नगर पालिका परिषद संभल बनाम सईदुल रहमान खां’ की एक रिट याचिका साल 2008 से विचाराधीन थी। लेकिन साल 2013 में तत्कालीन अधिशासी अधिकारी (EO) राजकुमार गुप्ता ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर इस मजबूत केस को ही वापस ले लिया था, जिससे भू-माफिया के हौसले बुलंद हो गए।
वर्तमान ईओ ने इस जालसाजी को भांपते हुए उच्च न्यायालय में पुनर्स्थापना प्रार्थनापत्र दाखिल किया है। पालिका के वर्तमान अभिलेखों की गहनता से पड़ताल हुई तो साफ हो गया कि सईदुल रहमान के नाम पर कभी कोई वैध पट्टा जारी ही नहीं हुआ था, बल्कि फर्जी दस्तावेजों के सहारे करोड़ों की जमीन दबाई गई थी।
मात्र 25 दिनों की मैराथन सुनवाई में जमींदोज हुआ भू-माफिया
संभल के वर्तमान डीएम अंकित खंडेलवाल को जब इस महा-घोटाले की गोपनीय शिकायत मिली, तो उन्होंने तत्काल कड़ा संज्ञान लिया। डीएम के निर्देश पर उपसंचालक चकबंदी न्यायालय में 3 जून 2026 को एक विशेष पुनर्स्थापना अपील दायर की गई।
कोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रतिदिन (डे-टू-डे) मैराथन सुनवाई की। सईदुल रहमान के वारिसों और उत्तराधिकारियों को कई नोटिस जारी किए गए, लेकिन वे कोर्ट में उपस्थित होने की हिम्मत नहीं जुटा सके। अंततः मात्र 25 दिन के भीतर 27 जून 2026 को उपसंचालक चकबंदी ओमप्रकाश अंजोर ने कपटपूर्ण तथ्यों को खारिज करते हुए गाटा संख्या 206, 207, 233, 242/378 और 279 की पूरी 38 बीघा भूमि को पुनः ग्राम सभा के नाम दर्ज करने का ऐतिहासिक हुक्म सुना दिया।
कार्रवाई के रडार पर भ्रष्ट अफसर, व्यावसायिक कब्जाधारकों को नोटिस
रविवार को डीएम अंकित खंडेलवाल और पुलिस अधीक्षक (SP) कृष्ण कुमार बिश्नोई भारी पुलिस बल के साथ खुद मौके पर पहुंचे। मुरादाबाद रोड स्थित इस कीमती जमीन के खाली पड़े बड़े हिस्से पर तुरंत सरकारी बोर्ड लगवाकर उसे ग्राम सभा को सौंप दिया गया है।
डीएम ने बताया कि इस जमीन के जितने हिस्से पर फिलहाल व्यावसायिक गतिविधियां (दुकानें, शोरूम या गोदाम) संचालित की जा रही हैं, उन सभी अवैध कब्जाधारकों को फौरन बेदखली के कड़े नोटिस जारी किए जा रहे हैं। इसके साथ ही, भू-माफिया को फायदा पहुंचाने वाले तत्कालीन उपसंचालक चकबंदी, तत्कालीन ईओ राजकुमार गुप्ता, तत्कालीन मानचित्रक शाहबुद्दीन और वर्तमान पैरोकार माजिद खां की भूमिका को बेहद संदिग्ध पाया गया है। इन सभी दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर ली गई है।



