सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों वाली संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अहम मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। करीब 16 दिनों तक चली सुनवाई में अदालत ने यह समझने की कोशिश की कि संविधान के तहत धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के समान अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। इस दौरान केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म वाली आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध बरकरार रखने की मांग की। सरकार का कहना था कि यह मामला धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता से जुड़ा है।

2018 के फैसले से शुरू हुई थी बड़ी बहस
दरअसल, सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक बताते हुए हटा दिया था। इस फैसले के बाद देशभर में व्यापक बहस और विरोध प्रदर्शन हुए। बाद में 2019 में शीर्ष अदालत ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया, ताकि धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों से जुड़े व्यापक सवालों पर विचार किया जा सके।
कई धर्मों की परंपराएं भी सुनवाई के दायरे में
सबरीमाला मामले के साथसाथ अदालत ने मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद और दरगाहों में प्रवेश तथा गैरपारसी पुरुषों से शादी करने वाली पारसी महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश जैसे मुद्दों पर भी सुनवाई की। अदालत के सामने सवाल यह भी था कि क्या धार्मिक संस्थाओं को अपने नियम तय करने का पूर्ण अधिकार है या फिर वे संविधान के समानता और मौलिक अधिकारों के दायरे में आएंगे।
संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 पर केंद्रित रही बहस
सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 को लेकर लंबी बहस हुई। अदालत ने यह समझने की कोशिश की कि व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों की सीमा क्या है। पीठ ने यह भी पूछा कि क्या धार्मिक प्रथाएं अन्य मौलिक अधिकारों से ऊपर हो सकती हैं। अब देश की नजर सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर टिकी है, जो धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के अधिकारों को लेकर आने वाले समय की संवैधानिक दिशा तय कर सकता है।



