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राम मंदिर चंदा चोरी पर हाईकोर्ट का प्रहार, ‘भ्रष्टाचारियों को मिले फांसी की सजा’, समाज की चुप्पी पर उठाए सवाल

Allahabad High Court Ram Mandir Donation Scam: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में देश में चल रहे भ्रष्टाचार और समाज की गिरती नैतिकता पर ऐसी सख्त टिप्पणी की है जो सोशल मीडिया से लेकर गलियारों तक चर्चा का विषय बन गई है। अयोध्या के राम मंदिर में चंदे की हेराफेरी के एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अतुल श्रीधरन ने न केवल भ्रष्टाचारियों को आईना दिखाया बल्कि समाज की उदासीनता पर भी  दुख व्यक्त किया।

राम मंदिर चंदा चोरी पर हाईकोर्ट का प्रहार, ‘भ्रष्टाचारियों को मिले फांसी की सजा’, समाज की चुप्पी पर उठाए सवाल
राम मंदिर चंदा चोरी पर हाईकोर्ट का प्रहार, ‘भ्रष्टाचारियों को मिले फांसी की सजा’, समाज की चुप्पी पर उठाए सवाल

जस्टिस श्रीधरन ने अपने 51 पन्नों के फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि जो लोग राम मंदिर जैसी पवित्र जगह पर हुई चंदे की चोरी से भी विचलित नहीं होते, उन्हें अब दुनिया की कोई भी चीज शर्मिंदा नहीं कर सकती।

‘ईमानदारी के पतन की पराकाष्ठा है यह चोरी’

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में भ्रष्टाचार को अब एक सामान्य बात मान लिया गया है। जस्टिस श्रीधरन ने कहा, “राम मंदिर में दान की चोरी का मामला ईमानदारी के गिरते स्तर की पराकाष्ठा है। अगर इतनी पवित्र जगह पर हुई धांधली भी लोगों के जमीर को नहीं झकझोरती तो यह हमारे समाज के लिए सबसे गंभीर चेतावनी है”। कोर्ट ने चिंता जताई कि जब तक कोई रंगे हाथों पकड़ा नहीं जाता तब तक उसे गलत नहीं माना जाता, जो एक खतरनाक मानसिकता है।

भ्रष्टाचार मिटाने के लिए ‘फांसी की सजा’ का सुझाव

समाज में कैंसर की तरह फैल रहे भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने के लिए हाईकोर्ट ने एक बेहद कड़ा सुझाव दिया है। जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि यदि राज्य सरकार वास्तव में इसे खत्म करना चाहती है तो उसे ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988’ में संशोधन करना चाहिए। कोर्ट का सुझाव है कि भ्रष्टाचार के दोषियों के लिए फांसी जैसा कड़ा प्रावधान होना चाहिए। जस्टिस ने आगाह किया कि यदि भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगी तो अमीर और गरीब के बीच बढ़ती यह खाई भविष्य में देश में बड़ी अशांति और असंतोष का कारण बनेगी।

बुलडोजर जस्टिस पर तीखे सवाल

यह सुनवाई राज्य सरकार के ‘बुलडोजर एक्शन’ से जुड़े एक मामले पर हो रही थी। इस पर जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि किसी अपराध के तुरंत बाद मकान ढहा देना दरअसल समाज की ‘खून की प्यास’ को शांत करने का एक तरीका बन गया है। उन्होंने हैरानी जताई कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट नियमों के बावजूद अधिकारी बिना किसी डर के तोड़फोड़ कर रहे हैं, मानो अदालत के फैसलों का कोई अस्तित्व ही न हो।

अधिकारियों की रिश्वतखोरी और अवैध निर्माण

अवैध निर्माणों के मुद्दे पर कोर्ट ने सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र को जिम्मेदार ठहराया। जस्टिस ने कहा कि कोई भी बिल्डिंग रातोंरात खड़ी नहीं हो जाती। यह अधिकारियों की रिश्वतखोरी और बिल्डरों को मिलने वाले संरक्षण का नतीजा होता है। ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकार ऐसी अवैध इमारतों को बिजली और पानी की सुविधा देकर खुद इस अपराध में भागीदार बन जाती है जबकि सालों बाद इसका खामियाजा उस आम खरीदार को भुगतना पड़ता है जिसे अचानक घर से बेदखल कर दिया जाता है।

ग्लोबल रिपोर्ट में भारत की स्थिति

कोर्ट ने की 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि 182 देशों की सूची में भारत 91वें स्थान पर है। जस्टिस श्रीधरन के अनुसार यह तथ्य भी हमें विचलित नहीं करता जो हमारी संवेदनहीनता को दर्शाता है। यह फैसला न केवल न्यायपालिका की सख्ती को दिखाता है बल्कि यह देश के हर नागरिक और नीतिनिर्माता के लिए एक बड़ा सवाल भी छोड़ता है।

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