Satya Report: अर्चना पूरन सिंह के बेटे आर्यमन सेठी ने हाल ही में अपने व्लॉग में अपनी जिंदगी के मुश्किल दौर और फुटबॉल करियर के बारे में खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि कैसे बचपन में बुलीइंग, रेसिज्म और अंदरूनी संघर्षों का सामना करते हुए उन्होंने भारत के लिए खेला, लेकिन एक गंभीर चोट ने उनका करियर खत्म कर दिया।

बुलीइंग का सामना और खुद बुली बन जाने का अफसोस
आर्यमान ने बताया कि बचपन में उन्हें सेलेब्रिटी का बेटा और रिच किड कहकर अलगथलग किया जाता था। वे अक्सर अपने से बड़े बच्चों के साथ खेलते थे, जहां उन्हें चिढ़ाया जाता, सामान छीन लिया जाता और परेशान किया जाता था।
उन्होंने कहा कि इस माहौल का असर उन पर ऐसा पड़ा कि जब वे अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलते, तो खुद ही बुली बन जाते। आज उन्हें अपने उस व्यवहार पर पछतावा है और वे इसे लेकर अपराधबोध महसूस करते हैं।
परिवारिक तनाव और मानसिक असर
आर्यमान ने अपने बचपन के उस दौर को भी याद किया जब उनके मातापिता परमीत सेठी और अर्चना के बीच तनाव था। घर का माहौल उनके लिए काफी भारी था, जिससे उन्हें हमेशा ऐसा लगता था कि वे दुनिया से लड़ रहे हैं। इंग्लैंड में ट्रेनिंग के दौरान भी वे अकेले भारतीय थे और वहां भी उन्हें बुलीइंग और रेसिज्म झेलना पड़ा।
पिता की सख्ती ने बनाया मजबूत खिलाड़ी
आर्यमान ने बताया कि उनके पिता ने उन्हें बहुत अनुशासन में रखा दोस्तों की बर्थडे पार्टी तक में जाने की अनुमति नहीं थी। लेकिन इसी सख्ती का नतीजा था कि सिर्फ चार महीनों में वे महाराष्ट्र अंडर13 के दूसरे सबसे तेज खिलाड़ी बन गए और आगे चलकर राज्य और देश के लिए खेले।
पाकिस्तान के खिलाफ शानदार प्रदर्शन
अर्चना ने गर्व से बताया कि एक मैच में आर्यमान ने पाकिस्तान के खिलाफ चार गोल दागे थे। यह उनके करियर का एक यादगार पल था, जिसने उन्हें खास पहचान दिलाई।
चोट ने तोड़ा सपना
अपने फुटबॉल करियर को आगे बढ़ाने के लिए आर्यमान को इंग्लैंड के क्लब Queens Park Rangers में ट्रायल का मौका मिला। लेकिन वहां उनका पैर टूट गया। इलाज के बाद जब वे भारत लौटे और एक मैच खेलने उतरे, तो शुरुआती सेकंड्स में ही फिर से चोट लग गई।
इस बार चोट इतनी गंभीर थी कि उनके पैर में रॉड डालनी पड़ी और डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि वे पहले जैसा प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे। यहीं से उनका फुटबॉल करियर खत्म हो गया।
थेरेपी से मिली नई दिशा
आर्यमान ने बताया कि इस बड़े नुकसान से उबरने में थेरेपी ने उनकी मदद की। धीरेधीरे उन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार किया और जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश की।
डिस्क्लेमर
यह लेख व्यक्तिगत अनुभवों, भावनात्मक संघर्ष, बुलीइंग और पारिवारिक परिस्थितियों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल कहानी प्रस्तुत करना और प्रेरणा देना है। इसे किसी भी प्रकार की पेशेवर मनोवैज्ञानिक या चिकित्सीय सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।



