IndiaTrending

भारत की प्रजनन दर 1.9 पहुंची, सुप्रीम कोर्ट ने दो बच्चों वाले कानूनों की उपयोगिता पर उठाए सवाल

भारत की प्रजनन दर 1.9 पहुंची, सुप्रीम कोर्ट ने दो बच्चों वाले कानूनों की उपयोगिता पर उठाए सवाल

नई दिल्ली: भारत में दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले नियमों को लेकर बड़ी कानूनी बहस शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 4 नवंबर 2026 को टिप्पणी की कि देश की बदलती जनसंख्या स्थिति और घटती प्रजनन दर को देखते हुए ऐसे कानूनों की प्रासंगिकता खत्म होती जा रही है। कोर्ट ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है, ताकि दो बच्चों की शर्त को सही ठहराने वाले अपने पुराने फैसले पर दोबारा विचार किया जा सके।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि देशभर में दो से ज्यादा बच्चे होने पर लागू सभी नियम तत्काल खत्म हो गए हैं। फिलहाल मामला कानूनी समीक्षा के लिए बड़ी पीठ के सामने जाएगा। इसलिए अलग-अलग राज्यों में लागू प्रावधानों की स्थिति पर अंतिम फैसला आना बाकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाए पुराने कानूनों पर सवाल?

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उन्हें तीसरा बच्चा होने के आधार पर सरपंच पद से अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जब वर्ष 2003 में दो बच्चों की नीति को सही ठहराया गया था, तब भारत की कुल प्रजनन दर करीब 3 थी। अब यह घटकर 1.9 रह गई है। अदालत के अनुसार, जनसंख्या बढ़ने की आशंका के आधार पर बनाए गए ऐसे प्रतिबंधों की उपयोगिता पर मौजूदा परिस्थितियों में फिर से विचार करने की जरूरत है।

पीठ ने यह भी चिंता जताई कि दो से ज्यादा बच्चे होने के कारण किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकना उसके लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और प्रजनन संबंधी स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से भी जोड़ा।

क्या है 2.1 की प्रजनन दर का मतलब?

इस मामले में प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) की चर्चा अहम है। इसका अर्थ है कि एक महिला अपने जीवनकाल में औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है।

आमतौर पर 2.1 की प्रजनन दर को रिप्लेसमेंट लेवल माना जाता है। इसका मतलब है कि लंबे समय में एक पीढ़ी अपनी जगह अगली पीढ़ी को बनाए रखने में सक्षम हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत की प्रजनन दर वर्ष 2003 में करीब 3 थी, जो अब घटकर 1.9 हो गई है। यानी देश इस समय रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है। अदालत ने आशंका जताई कि इसका असर भविष्य में आबादी की उम्र और कामकाजी लोगों की हिस्सेदारी पर पड़ सकता है।

किस मामले से शुरू हुई पूरी कानूनी बहस?

इस विवाद की जड़ वर्ष 2003 का जावेद बनाम हरियाणा मामला है। उस समय हरियाणा में पंचायत चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों की शर्त लागू थी। दो से ज्यादा जीवित बच्चे होने पर व्यक्ति को पंचायत चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया जा सकता था।

इस नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन तीन जजों की पीठ ने उस समय इसे संवैधानिक रूप से सही ठहराया था। अब करीब 23 साल बाद बदलती जनसंख्या परिस्थितियों को देखते हुए उसी फैसले की दोबारा समीक्षा का सवाल उठाया गया है।

मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने इस पुराने फैसले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है, क्योंकि पहले के तीन जजों के फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए बड़ी पीठ की जरूरत है।

महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच के मामले में क्या हुआ?

महाराष्ट्र के काकोड़ा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले को तीसरा बच्चा होने के आधार पर महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत अयोग्य घोषित किया गया था।

उन्होंने इस कार्रवाई को चुनौती दी थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी उनकी अयोग्यता के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

4 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उनके मामले में राहत देते हुए अयोग्यता के खिलाफ कार्रवाई को रोकने से जुड़ा आदेश दिया और दो बच्चों की शर्त की संवैधानिक वैधता पर व्यापक विचार के लिए मामला बड़ी पीठ को सौंप दिया।

किन राज्यों में अब भी लागू हैं दो बच्चों से जुड़े नियम?

भारत में दो बच्चों की शर्त को लेकर सभी राज्यों में एक जैसे कानून नहीं हैं। कुछ राज्यों ने पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में दो से ज्यादा बच्चों वाले उम्मीदवारों पर अयोग्यता का प्रावधान रखा है, जबकि कई राज्यों ने ऐसे नियम कभी लागू नहीं किए या बाद में हटा दिए।

सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की गई जानकारी के अनुसार, सात राज्यों ने दो बच्चों से जुड़े ऐसे प्रावधानों को खत्म कर दिया है, जबकि 15 राज्यों में इस तरह की नीति नहीं है। जिन राज्यों में ऐसे नियम जारी रहने की जानकारी दी गई, उनमें असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड शामिल हैं।

इन नियमों का दायरा और लागू होने की शर्तें राज्य के कानून के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी भी राज्य में चुनाव लड़ने की पात्रता तय करने के लिए वहां के मौजूदा कानून को देखना जरूरी है।

क्या अब तीसरा बच्चा होने पर चुनाव लड़ने से नहीं रोक पाएंगे?

फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने पुराने फैसले की समीक्षा के लिए मामला बड़ी पीठ को भेजा है, लेकिन देश के सभी राज्यों के कानून अपने आप समाप्त नहीं हुए हैं।

अब बड़ी पीठ यह तय करेगी कि बदलती जनसंख्या स्थिति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को देखते हुए दो बच्चों की शर्त वाले कानूनों को जारी रखना संवैधानिक रूप से उचित है या नहीं। उसके फैसले से भविष्य में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़े ऐसे नियमों पर बड़ा असर पड़ सकता है।

Satya Report डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट 4 नवंबर 2026 को सामने आई सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही और उपलब्ध कानूनी जानकारी पर आधारित है। दो बच्चों की शर्त से जुड़े कानूनों पर अंतिम कानूनी स्थिति बड़ी पीठ के फैसले के बाद स्पष्ट होगी।

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply