TrendingUttar Pradesh

​यूं ही नहीं कहलाता कानपुर ‘लेदर सिटी’, 200 साल पुरानी विरासत ने दुनिया में बनाई अलग पहचान

​यूं ही नहीं कहलाता कानपुर ‘लेदर सिटी’, 200 साल पुरानी विरासत ने दुनिया में बनाई अलग पहचान

कानपुर का चमड़ा आज पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान और गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। कभी ब्रिटिश आर्मी की जरूरतों को पूरा करने के लिए लगाए गए कारखानों से शुरू हुआ यह सफर आज पूरी दुनिया में अपनी अलग धमक रखने के साथ शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ और ऐतिहासिक पहचान रखता है। इसके चलते ही कानपुर को “लेदर सिटी” भी कहा जाता है। शहर का लेदर उद्योग आज 400 से अधिक कारखानों के साथ देश के कुल चमड़ा निर्यात में लगभग 70 प्रतिशत का योगदान देता है। ब्रिटिश काल में 19 वीं शताब्दी की शुरुआत में जब ब्रिटिश सेना ने कानपुर को अपना प्रमुख केंद्र बनाया, तब सैनिकों के लिए साजोसामान, काठी और जूतों की भारी मांग पैदा हुई। इसी मांग को पूरा करने के लिए शहर में ‘गवर्नमेंट हार्नेस एंड सैडलरी फैक्ट्री’ और ‘कूपर एलन एंड कंपनी’ जैसे बड़े कारखाने स्थापित किए गए। इन कंपनियों ने दोनों विश्व युद्धों के दौरान ब्रिटिश सैनिकों को भारी मात्रा में चमड़े के उत्पाद और जूते सप्लाई किए। 1947 में आजादी के बाद इस उद्योग ने स्थानीय उत्पादन और वैश्विक निर्यात की ओर रुख किया। जाजमऊ और उसके आसपास के क्षेत्रों में तमाम टेनरियां और जूते बनाने वाली फैक्ट्रियां स्थापित हुईं। 80 और 90 के दशक में उदारीकरण और आधुनिक तकनीकों ने कानपुर के चमड़े को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों विशेषकर यूरोप और अमेरिका तक पहुंचा दिया।

समय के साथ बदलता गया स्वरूप

समय के साथ बाजार बदला, जरूरतें बदली और बदल गया शहर का चमड़ा उद्योग। सेडलरी, जूते, रिवॉल्वर के कवर के लिए अपनी गुणवत्ता का लोहा मनवाने के बाद अब शहर के उद्यमी लगभग दो हजार से अधिक चमड़े के अलगअलग प्रोडक्ट बना रहे हैं। जाजमऊ इलाके में जहां गंगा बहती है, वहां सैकड़ों फैक्टरियां चमड़े को उत्पाद के रूप में ढालती हैं। यह उद्योग शहर के हजारों परिवारों की रोजीरोटी है। इसके अलावा देश की अर्थव्यवस्था में एक अहम भूमिका भी निभाता है।

कुछ इस तरह हुई शुरुआत 

1778 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने कानपुर में सैन्य छावनी बसाई। आर्मी कैंप की जरूरतों ने चमड़े के कारीगरों को आकर्षित किया। बूट्स, सैडलरी , हार्नेस ये सब ब्रिटिश सेना के लिए जरूरी थे। 1857 के बाद कानपुर ब्रिटिश साम्राज्य का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। 19 वीं सदी के अंत तक कई कंपनियां यहां सक्रिय थीं। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध ने इस उद्योग को और बढ़ावा दिया। युद्धों के दौरान लाखों जोड़ी जूते यहां बने। स्वतंत्रता के बाद आर्मी की मांग कम हुई, लेकिन 196070 के दशक में निर्यात शुरू हुआ। कच्चे चमड़े, सेमीफिनिश्ड लेदर और तैयार माल विदेश जाने लगा। आज यह क्लस्टर 200 साल से ज्यादा पुराना है।

मैनचेस्टर ऑफ द ईस्ट का तमगा

ब्रिटिश काल में कानपुर को मैनचेस्टर ऑफ द ईस्ट कहा जाता था। टेक्सटाइल के साथ चमड़ा उद्योग फलाफूला। गंगा नदी का पानी, सस्ती मजदूरी, कच्चा माल और सैन्य मांग ये सब फैक्टर काम आए। आज भी जाजमऊ और आसपास की टैनरियां इसी विरासत पर टिकी हैं। कानपुर मुख्य रूप से भैंस के चमड़े के लिए प्रसिद्ध है। यह टिकाऊ, मजबूत और सस्ता होता है। मुख्य उत्पादों में शामिल हैं। फिनिश्ड लेदर क्लस्टर का बड़ा हिस्सा। शहर में अब जूते, चप्पल, सैंडल, घुड़सवारी से जुड़े उत्पाद, बैग लेदर गारमेंट्स: जैकेट, कोट, बैग, बेल्ट, वॉलेट, हैंडबैग, एक्सेसरीज सहित अन्य उत्पाद यहां पर बन रहे हैं।

अमेरिका और यूरोप बड़ा बाजार

शहर में इस वक्त लगभग 22 सौ चमड़े से जुड़े निर्यातक कारोबार कर रहे हैं। इनमें लगभग 9 सौ बड़े निर्यातक मौजूद हैं। शहर में निर्यातकों के लिए सबसे बड़ा बाजार अमेरिका को माना जाता है। यह बाजार लगभग 2 हजार करोड़ रुपये के आसपास है। इसके अलावा यूरोप दूसरा सबड़े बड़ा बाजार माना जाता है।

50 देशों में निर्यात

कानपुर का चमड़ा व उससे बने उत्पाद फिलहाल 50 से अधिक देशों में निर्यात होते हैं। विश्व के कई देशों में फ्री ट्रेड एग्रिमेंट होने के बाद अब विदेशों में निर्यातकों का कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है। निर्यातकों के पास लगातार नए देशों के खरीदारों के ऑर्डर आ रहे हैं। इनमें खासतौर पर पारंपरिक उत्पादों के साथ ही छोटे उत्पादों की भी मांग बढ़ गई है। शहर का चमड़ा अपनी गुणवत्ता के चलते कई विदेशी उत्पादों को कई मुल्कों में पीछे छोड़ रहा है।

वैश्विक संकट के बावजूद बढ़ा निर्यात

शहर के लेदर उद्योग पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका की टैरिफ नीति, रूसयूक्रेन युद्ध और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इसके बावजूद लेदर उद्योग लगातार आगे बढ़ा है। कारोबारियों का कहना है कि यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ये बाधाएं नहीं आतीं, तो एक्सपोर्ट का आंकड़ा और भी ज्यादा होता। पिछले पांच वर्षों में कानपुर रीजन के लेदर एक्सपोर्ट में करीब 35 से 40 फीसदी तक की वृद्धि दर्ज की गई है। कारोबारियों का कहना है कि नई लेदर एंड फुटवियर पॉलिसी इस उद्योग के लिए गेम चेंजर साबित हो रही है। हाल ही में फियो की ओर से जारी रैंकिंग में कई संकट के बावजूद शहर ने निर्यात कारोबार के हिसाब से जारी सूची में अपनी रैंकिंग बरकरार रखी है। इस रैंकिंग में पहले स्थान पर गौतमबुद्ध नगर, दूसरे स्थान पर गाजियाबाद और तीसरे स्थान पर कानपुर है। निर्यात विशेषज्ञों का कहना है कि इस रैंकिंग में शहर की हिस्सेदारी यहां के चमड़ा कारोबार से है।

निर्यात में 70 फीसदी हिस्सेदारी

कानपुर रीजन के लेदर एक्सपोर्ट में करीब 35 से 40 फीसदी तक की वृद्धि दर्ज की गई है। 202021 में जहां यह आंकड़ा करीब 5,000 करोड़ रुपये था, वहीं अब बढ़कर करीब 7,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। कारोबारियों का कहना है कि प्रदेश की नई लेदर एंड फुटवियर पॉलिसी उद्योग के लिए गेम चेंजर साबित हो रही है। इसकी मदद से प्रदेश का पारंपरिक लेदर उद्योग अब बदलाव के नए दौर में प्रवेश कर चुका है। मौजूदा योगी सरकार की औद्योगिक नीतियों, बेहतर कानून व्यवस्था और निवेश को बढ़ावा देने वाली योजनाओं से नई गति मिली है। पिछले वित्तीय वर्ष में कानपुर रीजन से करीब 10,200 करोड़ रुपये का कुल एक्सपोर्ट दर्ज किया गया है। इसमें अकेले लेदर इंडस्ट्री का योगदान करीब 7,000 करोड़ रुपये रहा। यानी कानपुर रीजन के कुल निर्यात में लगभग 70 फीसदी हिस्सेदारी सिर्फ लेदर सेक्टर की रही। कारोबारियों का कहना है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद यह उपलब्धि उद्योग के मजबूत होते आधार की ओर इशारा करती है।

चुनौतियां भी भरपूर

प्रदूषण, नियम और भविष्य चमड़े की चमक के पीछे गंगा की कहानी दर्द भरी है। टैनिंग प्रक्रिया में क्रोम, केमिकल्स से प्रदूषण होता है। 2017 के बाद यूपीपीसीबी के सख्त नियमों, सीईटीपी की देरी और बंदिशों से कई यूनिट्स प्रभावित हुईं।

राजीव त्रिवेदी, कानपुर

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply