
संसार में सुख चाहने वालों को आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक तीन प्रकार के दुःख भोगने ही पड़ते हैं। आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक त्रिविध प्रकार के दुःख कहलाते हैं। धर्मशास्त्रों में त्रिविध दुःखों की चर्चा की गई है और इनकी निवृत्ति आवश्यक मानी गई है। इन तीन प्रकार के दुःखों को समझना अति आवश्यक है।
आध्यात्मिक दुःख
शरीर और मन के भीतर उत्पन्न होने वाले दुःखों को आध्यात्मिक दुःख कहते हैं, जैसे- बीमारी, बुढ़ापा, मानसिक चिंता, काम, क्रोध, लोभ इत्यादि। मनुष्य को अपने शरीर तथा इंद्रियों के सहयोग से शारीरिक रोग एवं मानसिक दुःख प्राप्त होता है, जिसकी निवृत्ति आवश्यक है।
आधिभौतिक दुःख
जो दुःख बाहरी दुनिया के अन्य प्राणियों के द्वारा जैसे- चोर, सर्प, हिंसक पशु, व्याघ्र आदि के द्वारा मनुष्य को प्राप्त होता है, उसे आधिभौतिक दुःख कहते हैं।
आधिदैविक दुःख
भाग्य जनित कष्ट आधिदैविक दुःख कहलाता है। यह परेशानी उन बाहरी ताकतों से आती है, जिन्हें मनुष्य आसानी से दूर नहीं कर सकता है, जैसे- प्राकृतिक आपदाएँ, बाढ़, भूकंप, सूखा, आकाशीय बिजली या भाग्य जनित कष्ट, अग्नि, वायु आदि प्राकृतिक तत्वों से जो दुःख होता है, वह इस श्रेणी में आता है।
त्रिविध ताप की निवृत्ति
जब मनुष्य ईश्वर की शरण, सत्संग, आत्मज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म का मार्ग अपनाता है, तब धीरे-धीरे इन तीनों तापों का प्रभाव कम होने लगता है। आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होने पर व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से कम विचलित होता है और भीतर शांति का अनुभव करता है। जिसे आत्मज्ञान और ईश्वर का आश्रय मिल गया, उसके लिए त्रिविध ताप भी शांति में परिवर्तित होने लगते हैं।
रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने त्रिविध ताप की निवृत्ति के विषय में कहा है-
यानी रामराज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति-मर्यादा में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं। कहा भी गया है कि संसार में रहो, लेकिन संसार को अपने अंदर न रहने दो।



