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मंडल-कमंडल और लड़ाकू अंदाज… बिहार में BJP के वो 8 एक्स फैक्टर, बिना सरप्राइज सम्राट चौधरी पर ही क्यों लगाया दांव

Bihar CM Samrat Chaudhary: बिहार में पहली बार सरकार की कमान संभाल रही भाजपा सत्ता में बदलाव के इस दौर में कोई भी जोखिम मोल नहीं लेना चाहती. सम्राट चौधरी के नाम पर मुहर लगाकर उसने किसी सरप्राइज से परहेज किया है.
मंडल-कमंडल और लड़ाकू अंदाज… बिहार में BJP के वो 8 एक्स फैक्टर, बिना सरप्राइज सम्राट चौधरी पर ही क्यों लगाया दांव

बिहार में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने जा रही बीजेपी ने इस बड़े सियासी बदलाव को बेहद संजीदगी से हकीकत में बदला है. 20 सालों से मुख्यमंत्री पद संभालने वाले नीतीश कुमार का विकल्प देने में पार्टी ने कोई राजनीतिक प्रयोग करने से परहेज किया और जातिगत समीकरणों को साधते हुए कुशवाहा जाति के सम्राट चौधरी पर दांव लगाया. ताकि पिछड़ों, दलितों-महादलितों की सियासत की धुरी बिहार में कोई नया खालीपन पैदा न हो और विपक्षी दल इस मौके को लपक न लें. सम्राट चौधरी के पास लंबा प्रशासनिक अनुभव है और ये बात भी उनके पक्ष में गई. बीजेपी ने  इस फैसले में मंडल, कमंडल और लड़ाकू अंदाज को ध्यान में रखा है. इससे पहले मध्य प्रदेश में मोहन यादव, राजस्थान में भजनलाल शर्मा और ओडिशा में मोहन चरण माझी के तौर पर सरप्राइज सीएम देकर सबको चौंकाया था.

 दमदार चेहरे की जरूरत

बीजेपी ने मध्य प्रदेश या राजस्थान में पार्टी के भीतर पिछली पायदान से नए चेहरे को तवज्जो दी. बीजेपी दशकों तक नीतीश कुमार की जेडीयू के साझेदार की भूमिका में थी. आरजेडी और जेडीयू में रहे सम्राट चौधरी पर भले ही बाहरी होने का ठप्पा लगाया जाए, लेकिन पार्टी को असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा जैसे ऐसे लड़ाकू चेहरे की जरूरत थी जो लालू यादव के MY समीकरण और नीतीश के लव-कुश वोट बैंक में सीधे सेंध लगा सके. सम्राट उस कोरी समुदाय से आते हैं जो बिहार की सत्ता की चाबी माना जाता है.

 नीतीश के बाद राजनीतिक खालीपन को भरना

नीतीश के केंद्र की राजनीति में लौटने के बाद बिहार के सत्तारूढ़ गठबंधन में बड़े नेता के तौर पर बड़ी शून्यता पैदा हुई है।. पहली बार मुख्यमंत्री बनाने के साथ ही बीजेपी कमान अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहती और मजबूती से खंबा गाड़ना चाहती है. राजनीति के धुरंधरों की धरा बिहार में मुख्यमंत्री की पहली पारी में ही किसी अनुभवहीन या सरप्राइज कैंडिडेट का जोखिम भरा कदम मोल लेना उसने मुनासिब नहीं समझा.

 नीतीश से अदावत की कहानी

सम्राट चौधरी भले ही पिछले दो साल से मुरैठा बांधकर सीधे नीतीश कुमार और लालू परिवार को चुनौती दे रहे थे.लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी सहजता और उनका आक्रामक तेवर दौड़ में उन्हें सबसे आगे रखने में सफल रहा.उनकी बुलडोजर वाली छवि भी यूपी के योगी मॉडल से मेल खाती है.  उनका यह लड़ाकू अंदाज बीजेपी के उस कोर कैडर को पसंद आता है जो सड़क पर उतरकर संघर्ष करना चाहता है.

 जातिगत जनगणना और मंडल 2.0 का जवाब

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार की राजनीति मंडल पार्ट 2 के दौर से गुजर रही है. जातीय जनगणना के आंकड़ों से मची उथल-पुथल के बीच भाजपा को एक ऐसे कद्दावर ओबीसी चेहरे की तलाश थी, जिसका कद जातिगत और सियासी पैमानों पर फिट बैठता हो. सम्राट चौधरी के जरिये बिहार में बीजेपी ने सियासी संदेश दिया है कि वो अब केवल सवर्णों की पार्टी नहीं, बल्कि पिछड़ों-दलितों के साथ लेकर चलने वाली समावेशी पार्टी है.

 

लव-कुश समीकरण में सेंधमारी

बिहार में नीतीश कुमार की ताकत का मुख्य आधार लव-कुश यानी कुर्मी-कोइरी वोट बैंक रहा है. सम्राट चौधरी कुशवाहा (कोइरी) समाज से आते हैं, जिसकी आबादी बिहार में करीब 4.2% से 5% है.बिहार में सोशल इंजीनियरिंग के सहारे पार्टी अभी पैठ और बढ़ाना चाहती है ताकि कभी भविष्य में गठबंधन की बैसाखी के बिना अगर सियासी मैदान में कूदना पड़े तो वो तैयार रहे. वो महाराष्ट्र के राजनीतिक अनुभव को भी पार्टी ने ध्यान में रखा है.

आरजेडी का आधार मुस्लिम-यादव वोटबैंक रहा है. बीजेपी ने ओबीसी सीएम सम्राट को तेजस्वी यादव को सियासी मौका नहीं दिया. हरियाणा, उत्तर प्रदेस की तरह यादव के मुकाबले अन्य पिछड़ी जातियों (EBC/OBC) को सत्ता का शीर्ष नेतृत्व दे सकती है. गैर यादव वोट बैंक का ये दांव बीजेपी हरियाणा और महाराष्ट्र में सफल आजमा चुकी है. प्रखर हिंदुत्व की नीतियों के साथ उसने मंडल और कमंडल दोनों को साथा है.बिहार में यादव 14 फीसदी हैं, लेकिन गैर यादव ओबीसी और ईबीसी मिलकर करीब 50% से ज्यादा हैं.

 प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक विरासत

सम्राट चौधरी के पास एक लंबी राजनीतिक विरासत है. वो शकुनी चौधरी के पुत्र हैं, जो खुद बिहार की राजनीति के दिग्गज रहे हैं।. सम्राट ने पहले भी कई सरकारों में मंत्री के तौर पर काम किया है. उनके पास शासन चलाने का अनुभव है, जो ट्रांजीशन पीरियड में अहम भूमिका अदा करेगा.

 सवर्ण और पिछड़े वोटों का संतुलन

बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक सवर्ण राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण, कायस्थ) रहा है. लेकिन सम्राट चौधरी एक ऐसे ओबीसी नेता हैं, जिनको बिहार के सवर्ण समाज में पसंद किया जाता है.सवर्णों के मुद्दों पर भी वो मुखर रहे हैं, जितने पिछड़ों के मामले में.

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