नरेंद्र मोदी के भाषणों में पंडित जवाहर लाल नेहरू की चर्चा और उनके फैसलों पर सवाल अकारण नहीं होते. इसमें व्यक्तिगत जैसा कुछ नहीं है. विशुद्ध रूप से यह विचारोंनीतियों की भिन्नता का परिणाम है. पंडित नेहरू ने सदैव संघ जनसंघ की सोच का उल्लेख करते हुए, उन्हें सांप्रदायिक बताया. यह सीख दी कि अल्पसंख्यकों के मुकाबले बहुसंख्यकों की साम्प्रदायिकता ज्यादा खतरनाक है. नेहरू के वारिसों ने इस सोच की आगे बढ़ाया. दूसरी ओर संघ जनसंघ भाजपा ने इसे वोट बैंक के लिए तुष्टिकरण बताते हुए संघर्षों के बीच अपनी प्रगति यात्रा जारी रखी.

1964 में पंडित नेहरू के निधन के 50 वर्ष बाद 2014 में संघ के संस्कारों में दीक्षित दृढ़ प्रतिज्ञ नरेंद्र मोदी ने केंद्र की भाजपा सरकार का नेतृत्व संभाला. प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने अपने वैचारिक पुरखों के संकल्पों और पार्टी की नीतियों को तेजी से लागू करना शुरू किया, जो यक़ीनन पंडित नेहरू की सोच और उनके अनेक फैसलों के खिलाफ माने जाते हैं. 10 जून को मोदी निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर पंडित नेहरू के 4399 दिनों के कार्यकाल से आगे निकल जायेंगे. इस मौके पर पढ़िए नेहरू के वे कुछ फैसले, जिन्हें मोदी ने पलटना जरूरी समझा. फिर चाहें योजना आयोग को नीति आयोग करने की बात हो या फिरसिंधु जल संधि अस्वीकार करने का मुद्दा हो.
योजना आयोग की जगह नीति आयोग
पंडित नेहरू ने 15 मार्च 1950 को सोवियत संघ की केंद्रीकृत नियोजन व्यवस्था से प्रेरित होकर योजना आयोग की स्थापना की थी. इसका उद्देश्य पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश के संसाधनों का नियोजन और विकास था. कृषि, उद्योग, ऊर्जा, शिक्षा आदि क्षेत्रों के लिए आयोग विस्तृत लक्ष्य निर्धारित करता था.
प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर बारहवीं पंचवर्षीय योजना तक आयोग ने काम किया .स्वतंत्रता के बाद सीमित संसाधनों वाले भारत में औद्योगिक आधार विकसित करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई. बड़े बांध, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, वैज्ञानिक संस्थानों और आधारभूत ढांचे के निर्माण और हरित क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार करने में उसका योगदान सराहा जाता है. लेकिन नौकरशाही के मकड़जाल,राज्यों की सीमित भागीदारी और बदलती बाजार अर्थव्यवस्था के अनुरूप लचीलेपन का अभाव उसके कमजोर पक्ष थे.
नीति आयोग. फोटो: PTI
जनसंघ और बाद में भाजपा ने लगातार दोहराया कि विदेशी मॉडल की नकल भारत के विकास की जरूरतों के लिए अनुपयुक्त है. मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में जो कुछ महत्वपूर्ण फैसले किए, उसमें योजना आयोग को समाप्त करना शामिल था. उसके स्थान पर उन्होंने 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग का गठन किया. देश की जमीनी जरूरतों और योजनाओं की वास्तविकता को आयोग की प्राथमिकताओं में शामिल किया गया. हितधारक राज्यों की भूमिका प्रभावी की गई. वित्तीय प्रबंधन का जिम्मा वित्त मंत्रालय को सौंपा गया. नीति आयोग की भूमिका योजनाओं के सिलसिले में थिंक टैंक तक सीमित की गई.
जाहिर है कि मोदी के इस फैसले का कांग्रेस और नेहरू समर्थकों ने विरोध किया. इसे नेहरू विरोध की ग्रंथि बताया गया. असलियत में मोदी के इस फैसले की वजह संघ और भाजपा की वह सोच थी, जिसके मुताबिक नेहरू के रास्ते चलकर विकास के मोर्चे पर देश वह सब कुछ हासिल नहीं कर सका, जो उसे अब तक मिल जाना चाहिए था.
जब संघ से प्रतिबंध हटाया गया, तब भी नेहरू ने लिखा कि सरकार उसकी नीयत को लेकर आश्वस्त नहीं है. फोटो: PTI
संघजनसंघ हमेशा नेहरू के निशाने पर रहे
मजहब के नाम पर देश के विभाजन के बाद भी देश साम्प्रदायिकता के संकट से मुक्त नहीं हो सका. दंगों और बड़े पैमाने पर विस्थापन की विपदा के बीच पंडित नेहरू सेक्युलर भारत की स्थापना की उम्मीद संजोए रहे. इसके लिए अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर उन्होंने खास फोकस किया. उनकी सुरक्षा की बात करते हुए वे हिंदूवादी शक्तियों पर लगातार आक्रामक रहे. संघ के वे पहले ही आलोचक थे. महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर उनके हमले और तेज हुए. 11 फरवरी 1948 को पंजाब के मुख्यमंत्री को उन्होंने लिखा कि इन लोगों के हाथ महात्मा गांधी के खून से रंगे हैं. 1 अगस्त 1949 को देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखा कि संघ की विचारधारा फासीवादी है.
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू. फोटो: Getty Images
उसकी गतिविधियों पर निकट से निगरानी रखी जानी चाहिए. 20 जुलाई 1949 को, जब संघ से प्रतिबंध हटाया गया, तब भी नेहरू ने लिखा कि सरकार उसकी नीयत को लेकर आश्वस्त नहीं है. हिंसक या विध्वंसक गतिविधियों के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जाएगी. उन्होंने भारतीय जनसंघ को भी नहीं बख्शा. उसे सांप्रदायिक राजनीतिक दल बताते हुए अपने कई भाषणों में कहा कि अगर भारत में कोई सांप्रदायिक संगठन है तो वह जनसंघ है. उसे पूर्णतः प्रतिक्रियावादी भी कहा और आरोप लगाया कि जमींदारों, रियासतों और रूढ़िवादी शक्तियों का उसे समर्थन प्राप्त है.
नेहरू का मानना था कि बहुसंख्यक समुदाय की सांप्रदायिकता अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता से अधिक खतरनाक हो सकती है. संघ, जनसंघ से मुकाबले की जरूरत बताते हुए उन्होंने कहा था कि यदि हम इनका मुकाबला नहीं करेंगे तो यह भारत को उसकी जड़ों से उखाड़ देंगे. दूसरी ओर संघ जनसंघ अल्पसंख्यकों को विशेष संरक्षण की नीति को तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति बताता रहा.
संघ ने इसका सदैव विरोध किया. इसे देश की एकता अखंडता और सामाजिक समरसता के लिए खतरा माना. नेहरू का 27 मई 1964 को निधन हुआ. पचास वर्षों के अंतराल पर 26 मई 2014 को उन नरेंद्र मोदी ने भाजपा के पूर्ण बहुमत की सरकार में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली , जिनका संघ से बाल स्वयं सेवक के रूप में जुड़ाव रहा और आगे की जीवन यात्रा में यह और सघन सजीव होता गया.
पीएम मोदी.
अल्पसंख्यकों के संरक्षण नहीं, सबका साथसबका विकास
प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने नेहरू की उस सोच पर प्रहार किया जो अल्पसंख्यकों के संरक्षण के नाम पर तुष्टिकरण बन वोट बैंक की राजनीति में बदल गई. अपने संबोधनों में मोदी ने हमेशा किसी वर्ग और समूह के उल्लेख के स्थान पर एक सौ चालीस करोड़ भारतीयों की बात की. सबका साथसबका विकाससबका विश्वास का संकल्प लिया. सरकारी योजनाओं के लाभ वितरण में नागरिकों बीच किसी प्रकार के भेदभाव की शिकायत का उन्होंने मौका नहीं दिया. लेकिन साथ ही नागरिकता कानून, तीन तलाक और वक्फ एक्ट में संशोधन जैसे कदम उठाते समय उन्होंने विरोध की परवाह भी नहीं की.
ऐसे फैसले लेते समय कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप से नेहरू दौर के फैसलों को पलटते मोदी अलग लकीर खींचते हैं. सदियों पुराने राम मंदिर विवाद में नेहरू और संघ परिवार विपरीत किनारों पर रहा है. दिसंबर 1949 में अयोध्या मंदिर में मूर्तियों के प्रकटीकरण को पंडित नेहरू ने गलत माना था. मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से उन्हें हटाने को कहा था. पटेल, पंत इसके लिए राजी नहीं हुए थे. राम मंदिर के आंदोलन से लेकर उसके निर्माण के पूर्ण होने तक नेहरू की यह भूमिका कभी संघ परिवार और कभी नरेंद्र मोदी के निशाने पर आती रही.
पंडित नेहरू. फोटो: Getty Images
सिंधु जल संधि अस्वीकार
24 अप्रैल 2025 को मोदी सरकार ने नेहरू सरकार के समय की पाकिस्तान के साथ 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया. असलियत में यह संधि भारत की अतिशय उदारता का परिणाम मानी जाती रही है. बावजूद इसके पाकिस्तान के भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैए में लगातार बढ़ोत्तरी हुई. पंडित नेहरू के बाद की कई सरकारें इसे लेकर खिन्न रहीं लेकिन आगे कदम बढ़ाने में हिचकती रहीं. अपने पहले कार्यकाल से ही मोदी की इस पर नजर थी. 22 अप्रैल 2025 को पाकिस्तानी आतंकियों ने पहलगाम में 26 निर्दोष पर्यटकों की निर्मम हत्या कर दी.
इस हृदयविदारक घटना के प्रतिकार में मोदी सरकार ने सिर्फ ऑपरेशन सिंदूर से ही पाकिस्तान को सबक नहीं सिखाया. बल्कि पानी और खून एक साथ बह नहीं सकता , के जिक्र के साथ सिंधु जल संधि भी निलंबित कर दी. पंडित नेहरू के उदार फैसलों की सूची में 1960 की सिंधु जल संधि का खास स्थान है. यह उदारता देश के लिए नुकसानदेह साबित हुई. इस संधि के तहत सिंधु नदी तंत्र की की छह में से तीन सबसे बड़ी नदियों को विशेष रूप से नीचे की ओर स्थित पाकिस्तान के लिए छोड़ने पर सहमति जताई गई . संधि में सिंधु तंत्र के 80.52 फीसद पानी को अनिश्चित काल के लिए पाकिस्तान को दिए जाने की व्यवस्था है. इससे जम्मूकश्मीर और बड़ी हद तक पंजाब के हितों की अनदेखी हुई. आधुनिक विश्व इतिहास का इसे सबसे उदार जल समझौता माना जाता है. तमाम अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बाद भी मोदी सरकार संधि की बहाली के लिए तैयार नहीं हुई है.
संघ का राष्ट्रवाद: नेहरू की नजर में बहुसंख्यकों की साम्प्रदायिकता
संघ परिवार के राष्ट्रवाद को पंडित नेहरू ने हिंदू सांप्रदायिकता के नज़रिए से देखा. नेहरू का मानना था कि बहुसंख्यक समुदाय की सांप्रदायिकता अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता से अधिक खतरनाक हो सकती है. उन्होंने कहा था कि भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा साम्यवाद नहीं, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता है. यह भी कहा था कि अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिकता पहचान में आ जाती है, लेकिन बहुसंख्यक समुदाय की सांप्रदायिकता को अक्सर राष्ट्रवाद समझ लिया जाता है.
प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने नेहरू की इस सोच पर प्रहार का कोई मौका नहीं गंवाया. राष्ट्रगीत वन्देमातरम की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने पर दिल्ली में 7 नवंबर 2025 को आयोजित विशेष कार्यक्रम में मोदी ने न केवल हिस्सेदारी की बल्कि यह भी याद दिलाया कि किस तरह सांप्रदायिक ताकतों के दबाव में नेहरू कमेटी ने इस गीत के प्रारंभिक केवल दो अंतरों के गायन को सहमति दी. पूर्ण गीत के गायन की अनिवार्यता और संपूर्ण देश में इससे जुड़े आयोजनों के जरिए मोदी सरकार ने नेहरू दौर की कमजोरी के प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी.
सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूर्ण होने पर अपने लेखों और भाषणों में इस पुनीत कार्य में सरदार पटेल के योगदान और नेहरू के विरोध के उल्लेख में मोदी नहीं चूके. नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की 11 मई 1951 की उपस्थिति का विरोध किया था. नेहरू का तर्क था कि सेक्युलर भारत के राष्ट्रपति की किसी धार्मिक कार्यक्रम में हिस्सेदारी गलत संदेश देगी. राजेंद्र प्रसाद फिर भी नहीं माने थे. नाराज नेहरू ने उनके कार्यक्रम की सरकारी कवरेज पर रोक लगा दी थी. 75 वर्ष के अंतराल पर सब कुछ बदल चुका था. सोमनाथ अमृत महोत्सव में 11मई 2026 को प्रधानमंत्री मोदी पूरे उत्साह के साथ सम्मिलित हुए. विधि विधान से पूजन अर्चन किया. असलियत में मोदी बार बार संदेश देने की कोशिश करते हैं कि नेहरू युगीन सोच से भारत उबर और बहुत आगे निकल चुका है.



