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15 हजार फीट ऊपर बसा भारत का वो गांव, जहां सांस लेना भी चुनौती! गोबर से गर्म होते हैं घर​​​​​​

हिमाचल प्रदेश की स्पीति घाटी में एक ऐसा गांव बसा है, जिसे देखकर आपको कुछ पल के लिए लगेगा कि आप धरती पर नहीं, किसी दूसरे ग्रह पर पहुंच गए हैं। चारों तरफ बंजर पहाड़, बेहद कम ऑक्सीजन, जमा देने वाली ठंड और दूर-दूर तक पेड़ों का नामोनिशान नहीं। इस दुर्गम दुनिया का नाम है कोमिक

समुद्र तल से करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित कोमिक को भारत के सबसे ऊंचे बसे हुए गांवों में गिना जाता है। यहां जिंदगी सामान्य शहरों और मैदानी इलाकों से बिल्कुल अलग है। यहां रहने वाले लोगों ने प्रकृति की कठिन परिस्थितियों के साथ ऐसा तालमेल बना लिया है कि वे इन्हीं हालात में पीढ़ियों से अपना जीवन जी रहे हैं।

सांस लेना तक हो जाता है मुश्किल

इतनी अधिक ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन काफी कम होती है। यहां आने वाले बाहरी लोगों को शरीर के इस बदलाव का तुरंत एहसास हो सकता है। कम ऑक्सीजन की वजह से सिरदर्द, थकान और सांस फूलने जैसी परेशानियां हो सकती हैं।

लेकिन स्थानीय लोगों का शरीर इन परिस्थितियों का आदी हो चुका है। पीढ़ियों से इस ऊंचाई पर रहने की वजह से उनका शरीर कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में खुद को बेहतर ढंग से ढाल चुका है।

यही वजह है कि जो वातावरण किसी बाहरी व्यक्ति के लिए बेहद कठिन हो सकता है, वहीं स्थानीय लोग रोजमर्रा के काम करते नजर आते हैं।

यहां पेड़-पौधे क्यों नहीं दिखते?

कोमिक ठंडे रेगिस्तानी इलाके में आता है। यहां मौसम इतना कठोर है कि पेड़-पौधों के लिए सामान्य रूप से बढ़ पाना बेहद मुश्किल है।

सर्दियों में तापमान काफी नीचे चला जाता है और पानी तक जम सकता है। ऐसे में हरियाली बहुत कम दिखाई देती है। गांव के आसपास का नजारा भी किसी सामान्य पहाड़ी गांव जैसा नहीं, बल्कि विशाल भूरे और सूखे पहाड़ों से घिरा हुआ नजर आता है।

यही वजह है कि यहां ईंधन के लिए लकड़ी आसानी से उपलब्ध नहीं होती।

रात में गोबर बनता है सबसे बड़ा सहारा

जहां पेड़ नहीं हैं, वहां ईंधन का इंतजाम भी अलग तरीके से करना पड़ता है। स्थानीय लोग गाय, याक और दूसरे पशुओं के गोबर को सुखाकर रखते हैं।

सूखा गोबर यहां ईंधन की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इससे खाना पकाने के साथ-साथ घर के अंदर गर्मी बनाए रखने में भी मदद मिलती है।

यानी जिस चीज को मैदानी इलाकों में बेकार समझा जाता है, वही कोमिक जैसे बेहद ठंडे इलाके में लोगों के लिए सर्द रातों का बड़ा सहारा बन जाती है।

दो-दो फीट मोटी दीवारों वाले घर

यहां के पारंपरिक घर भी स्थानीय मौसम को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। मिट्टी के घरों की मोटी दीवारें अंदर की गर्मी को बनाए रखने में मदद करती हैं और बाहर की कड़ाके की ठंड से बचाव करती हैं।

कई घरों की दीवारें काफी मोटी होती हैं। घरों की बनावट देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां के लोगों ने सदियों में किस तरह अपने रहने के तरीके को मौसम के हिसाब से बदला है।

सर्दियों की भयंकर ठंड के दौरान पशुओं को भी घर के नजदीक या अंदर रखने की परंपरा देखने को मिलती है, ताकि उन्हें भी अत्यधिक ठंड से बचाया जा सके।

पानी के लिए ग्लेशियर पर निर्भरता

इतनी ऊंचाई और ठंड के बावजूद यहां रहने वाले लोगों के लिए पानी का इंतजाम प्रकृति ही करती है।

इलाके में ग्लेशियर से जुड़ी जलधाराएं लोगों के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। बेहद ठंडे वातावरण में पानी का जमना आम बात है, इसलिए जहां पानी उपलब्ध रहता है, वह स्थानीय जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन जाता है।

खाना भी है बिल्कुल अलग

कठिन मौसम का असर यहां के खान-पान पर भी दिखाई देता है। स्थानीय लोग ऐसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं, जो शरीर को ऊर्जा देने में मदद करते हैं।

जौ से बने खाद्य पदार्थ, घी, पनीर और अन्य स्थानीय चीजें यहां के भोजन का हिस्सा हैं। ठंडे मौसम में शरीर को पर्याप्त ऊर्जा देने के लिए पौष्टिक और कैलोरी वाले भोजन की अहम भूमिका रहती है।

पहाड़ों का नजारा लगता है मंगल ग्रह जैसा

कोमिक और आसपास की स्पीति घाटी का भूगोल बेहद अनोखा है। यहां दूर तक फैले सूखे पहाड़ और चट्टानों की अलग-अलग आकृतियां किसी दूसरे ग्रह की सतह जैसी दिखाई देती हैं।

इसी वजह से स्पीति को कई बार ‘कोल्ड डेजर्ट’ और यहां के कुछ इलाकों को चंद्रमा या मंगल ग्रह जैसी सतह से तुलना की जाती है।

यहां की खूबसूरती हरियाली में नहीं बल्कि विशाल, सूखे और रहस्यमयी पहाड़ों में छिपी है।

पास के गांव में समुद्र के निशान

कोमिक के आसपास का इलाका भूवैज्ञानिक दृष्टि से भी बेहद खास है। लांग्जा जैसे आसपास के इलाकों में समुद्री जीवों के प्राचीन जीवाश्म पाए जाते हैं।

इन जीवाश्मों से हिमालय के भूवैज्ञानिक इतिहास को समझने में मदद मिलती है। करोड़ों साल पहले इस क्षेत्र का संबंध प्राचीन समुद्र से रहा होने के प्रमाण वैज्ञानिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

यानी आज जहां सिर्फ ऊंचे पहाड़ दिखाई देते हैं, वहां कभी समुद्र हुआ करता था।

हिक्किम का डाकघर भी है खास

कोमिक के आसपास का इलाका सिर्फ अपनी ऊंचाई और कठिन जीवन के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है। पास का हिक्किम गांव भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।

हिक्किम का डाकघर लंबे समय से दुनिया के सबसे ऊंचे डाकघरों में गिना जाता रहा है। इतनी दुर्गम जगह पर भी डाक व्यवस्था का कायम रहना इस इलाके की खास पहचान बन चुका है।

मुश्किल जिंदगी, लेकिन लोगों में गजब की एकता

कोमिक में घरों की संख्या कम है और आबादी भी सीमित है। लेकिन मुश्किल परिस्थितियों में रहने वाले इन लोगों की आपसी एकता उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

किसी परिवार के घर में शादी, धार्मिक आयोजन या कोई दूसरा कार्यक्रम हो, तो पूरा गांव एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आता है।

यहां जिंदगी आसान नहीं है। न शहर जैसी सुविधाएं हैं, न घनी हरियाली और न ही हर समय उपलब्ध संसाधन। लेकिन इन सबके बावजूद कोमिक के लोग अपनी परंपराओं और आपसी सहयोग के सहारे इस कठोर वातावरण में जीवन को आगे बढ़ा रहे हैं।

कोमिक सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि इंसान और प्रकृति के बीच बने उस अद्भुत रिश्ते की कहानी है, जहां बेहद कम ऑक्सीजन, जमा देने वाली ठंड और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रहती है।

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