जमीन का विवाद हो तो अक्सर मामला थाने तक पहुंच जाता है. एक पक्ष पुलिस से शिकायत करता है तो दूसरा भी अपनी बात लेकर थाने पहुंच जाता है. कई बार लोग उम्मीद करते हैं कि पुलिस मौके पर जाकर कब्जा दिला देगी या दूसरे पक्ष को जमीन से हटा देगी. लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब ऐसे मामलों में पुलिस और प्रशासन की भूमिका को लेकर साफ कर दिया है कि निजी जमीन के मालिकाना हक, कब्जे या जमीन की सीमा से जुड़े विवाद का फैसला पुलिस नहीं कर सकती.

ऐसे मामलों में फैसला सक्षम सिविल कोर्ट ही करेगा. पुलिस की भूमिका केवल कानूनव्यवस्था बनाए रखने और किसी तरह की हिंसा या शांति भंग को रोकने तक सीमित है. कोर्ट ने अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वो अपनी सीमा से बाहर जाकर किसी एक पक्ष का साथ देते हैं या दूसरे पक्ष को जमीन से हटाने की कोशिश करते हैं, तो उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ अवमानना की कार्रवाई भी हो सकती है. यानी अब अगर जमीन विवाद में आते हैं पुलिस, तो उन पर अवमानना का केस फाइल कर सकते हैं.
जमीन विवाद में पुलिस नहीं देंगे दखल
जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की पीठ ने कहा कि पुलिस या कार्यकारी अधिकारी निजी संपत्ति के विवाद में जज की तरह फैसला नहीं कर सकते. वे किसी एक पक्ष को कब्जा नहीं दिला सकते और न ही दूसरे पक्ष को जमीन से बेदखल कर सकते हैं, जब तक सक्षम अदालत का आदेश न हो. कोर्ट ने अधिकारियों को 2014 और 2015 के सरकारी आदेशों के साथ डीजीपी के सर्कुलर का पालन करने का निर्देश भी दिया.
- पुलिस जमीन के मालिकाना हक का फैसला नहीं कर सकती.
- जमीन के कब्जे और सीमा का विवाद सिविल कोर्ट देखेगा.
- पुलिस का काम कानूनव्यवस्था और शांति बनाए रखना है.
- पुलिस किसी एक पक्ष को जबरन कब्जा नहीं दिला सकती.
- अदालत के आदेश के बिना किसी को जमीन से हटाना गलत है.
- नियम तोड़ने वाले अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई हो सकती है.
यूपी में जमीन के कितने मामले
आखिर मामला क्या था?
मामला 85 साल की एक महिला की याचिका से जुड़ा था. महिला ने आरोप लगाया कि पारिवारिक संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद में पुलिस उसे परेशान कर रही है. उनका कहना था कि पुलिस दूसरे पक्ष का साथ दे रही है और उनके निर्माण कार्य में भी रुकावट पैदा की जा रही है. महिला की ओर से अदालत में कहा गया कि जब संपत्ति का विवाद पहले से सिविल कोर्ट में लंबित है, तो पुलिस को किसी एक पक्ष के पक्ष में खड़ा नहीं होना चाहिए.
हाईकोर्ट ने याचिका पर राहत नहीं दी, क्योंकि संपत्ति से जुड़ा मूल विवाद पहले से सक्षम सिविल कोर्ट में विचाराधीन था. इसी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मालिकाना हक, कब्जे और जमीन की सीमा जैसे सवालों का फैसला पुलिस या प्रशासन नहीं कर सकता.
पुलिस क्या कर सकती है और क्या नहीं?
इस फैसले को आसान भाषा में समझें तो अगर दो लोगों के बीच जमीन को लेकर विवाद है, तो पुलिस यह तय नहीं कर सकती कि जमीन किसकी है. केवल शिकायत मिलने के आधार पर पुलिस किसी एक व्यक्ति को जमीन का कब्जा भी नहीं दिला सकती और न ही दूसरे पक्ष को जमीन से बाहर कर सकती है.
अगर जमीन विवाद की वजह से मारपीट, हिंसा या शांति भंग होने का खतरा है, तो पुलिस कानून के मुताबिक कार्रवाई कर सकती है. पुलिस का काम अपराध रोकना और कानूनव्यवस्था बनाए रखना है, न कि जमीन के मालिकाना हक का फैसला करना. यानी पुलिस विवाद की वजह से होने वाली हिंसा रोक सकती है.
पुराने सरकारी आदेश और डीजीपी सर्कुलर का भी जिक्र
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के 2014 और 2015 के आदेशों का भी हवाला दिया. कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी निजी जमीन के मालिकाना हक या कब्जे के विवाद में फैसला नहीं कर सकते. उनका काम कानूनव्यवस्था बनाए रखना और सक्षम अदालत के आदेश का पालन कराना है. कोर्ट ने 2024 के एक फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें पुलिस महानिदेशक को पुलिसकर्मियों के लिए दिशानिर्देश जारी करने को कहा गया था.
इसके बाद डीजीपी के सर्कुलर में भी यह साफ किया गया कि पुलिस किसी सिविल विवाद में किसी पक्ष को कब्जा नहीं दिलाएगी और न ही किसी व्यक्ति को जबरन बेदखल करेगी. अगर शांति भंग होने का खतरा हो तो कानून के मुताबिक एहतियाती कार्रवाई की जा सकती है.
यूपी में जमीन और राजस्व विवाद कितने बड़े?
हाईकोर्ट के इस फैसले को उत्तर प्रदेश के राजस्व न्यायालयों के आंकड़ों से जोड़कर देखें तो जमीन और संपत्ति से जुड़े विवादों की तस्वीर काफी बड़ी नजर आती है. उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व न्यायालय की कम्प्यूटरीकृत प्रबंधन प्रणाली के 4 अगस्त 2026 के डैशबोर्ड के मुताबिक, राज्य के 2,584 राजस्व न्यायालयों में 2,69,31,179 मामले पोर्टल पर दर्ज हैं.
जमीन विवाद में पुलिस क्या कर सकती है?
इनमें से 2,55,91,925 मामलों का मामला खत्म हो चुका है, जबकि 13,39,254 मामले अभी लंबित हैं. यानी करीब 13.39 लाख मामले अभी भी राजस्व न्यायालयों में लंबित हैं. इनमें 2,52,326 मामले एक साल से ज्यादा पुराने, 52,631 मामले तीन साल से ज्यादा पुराने और 56,203 मामले पांच साल से ज्यादा समय से लंबित हैं.
1 साल से ज्यादा पुराने कितने मामले?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कुल लंबित मामलों में करीब 2.47 लाख मामले एक साल से ज्यादा पुराने हैं. इनमें 58.7 हजार से ज्यादा मामले पांच साल से भी पुराने हैं. इससे यह समझ आता है कि जमीन और दूसरे राजस्व विवादों में सिर्फ मामला दर्ज होना ही चुनौती नहीं है, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया भी बड़ी समस्या है.
अफसरों को हाईकोर्ट की सख्त चेतावनी
कोर्ट ने सिर्फ नियम बताकर बात खत्म नहीं की, बल्कि अधिकारियों को सख्त चेतावनी भी दी. पुलिस अधिकारियों, जिलाधिकारियों, एसडीएम और दूसरे कार्यकारी अधिकारियों को सरकारी आदेशों और डीजीपी के निर्देशों का पालन करने को कहा गया. कोर्ट ने साफ किया कि अगर कोई अधिकारी अपनी सीमा से बाहर जाकर जमीन विवाद में किसी एक पक्ष का साथ देता है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ अवमानना की कार्रवाई भी हो सकती है.
साथ ही पुलिस को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जमीन विवाद में कोई भी पक्ष कानून अपने हाथ में न ले. यानी पुलिस न तो किसी एक पक्ष को जमीन दिला सकती है और न ही दूसरे पक्ष को मनमाने तरीके से हटा सकती है. उसका काम दोनों पक्षों के बीच शांति बनाए रखना और अपराध होने से रोकना है.


