
एडिलेडः ऑस्ट्रेलिया में कथित तौर पर कुछ नियोनाजी संगठन ऑटिज्म से प्रभावित युवाओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इस बीच सामने आए कुछ शोध संकेत देते हैं कि ऑटिज्म से प्रभावित कुछ लोग ऑनलाइन साजिश संबंधी धारणाओं, गलत सूचनाओं और चरमपंथी विचारों वाली सामग्री की ओर अपेक्षाकृत अधिक आकर्षित हो सकते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि केवल ऑटिज्म के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई व्यक्ति चरमपंथी विचारधारा की ओर क्यों आकर्षित होगा या हिंसा में शामिल होगा।
शोधकर्ताओं के मुताबिक असली सवाल यह है कि ऐसी कौनसी सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियां हैं, जो ऑटिज्म से प्रभावित कुछ लोगों को चरमपंथी समूहों के भर्ती प्रयासों के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती हैं। इनमें सामाजिक बहिष्कार, अकेलापन, सीमित सहयोग और अपनी जरूरतों के पूरा न होने जैसी स्थितियां अहम हो सकती हैं।
शोध करना क्यों है चुनौतीपूर्ण?
ऑटिज्म और ऑनलाइन चरमपंथी सामग्री के बीच संभावित संबंध पर शोध तेजी से सामने आ रहा है, लेकिन अभी उपलब्ध प्रमाण सीमित हैं। शोधकर्ताओं की एक हालिया समीक्षा में पाया गया कि इस संबंध को लेकर पर्याप्त संख्या में ऐसे अध्ययन मौजूद नहीं हैं, जिनके निष्कर्ष बड़े स्तर के वास्तविक आंकड़ों पर आधारित हों।
इसके अलावा, इस विषय पर शोध में नैतिक और कानूनी अड़चनें भी हैं। चरमपंथी गतिविधियां अक्सर छिपकर या कानून के दायरे से बाहर होती हैं, इसलिए ऐसे लोगों की पहचान करना और उनका अध्ययन करना मुश्किल होता है।
फिलहाल आपराधिक मामलों के विस्तृत अध्ययन से इस संबंध को समझने में मदद मिलती है। हालांकि, ऐसे मामलों की संख्या सीमित होने के कारण यह पता लगाना संभव नहीं होता कि चरमपंथ की ओर जाने वाले रास्ते कितने आम हैं। इन निष्कर्षों को ऑटिज्म से प्रभावित पूरी आबादी पर लागू करना भी उचित नहीं माना जा सकता।
गहरी रुचि बन सकती है संवेदनशीलता का एक हिस्सा
ऑटिज्म से प्रभावित कुछ लोगों में किसी विशेष विषय के प्रति बेहद गहरी और लंबे समय तक बनी रहने वाली रुचि देखी जाती है। इसे केंद्रित रुचि कहा जाता है। किसी विषय पर गहराई से ध्यान देना अपने आप में नकारात्मक नहीं है। इससे पढ़ाई, रोजगार, रचनात्मक गतिविधियों और सामाजिक संबंधों के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार परेशानी तब हो सकती है, जब ऐसी गहरी रुचि गलत सूचनाओं, साजिश संबंधी धारणाओं, चरमपंथी विचारधारा या हिंसा जैसे नुकसान पहुंचाने वाले विषयों पर केंद्रित हो जाए।
एक ही विचार बारबार देखने से बढ़ सकता है विश्वास
कुछ शोधों में संकेत मिले हैं कि जो लोग अपनी स्थापित सोच पर अधिक मजबूती से टिके रहते हैं, वे विरोधी तर्कों या किसी मुद्दे की दूसरी व्याख्याओं पर विचार करने में कम इच्छुक हो सकते हैं।
यदि चरमपंथी विचार किसी व्यक्ति की गहरी रुचि का विषय बन जाएं और उसे लगातार उसी तरह की सामग्री मिलती रहे, तो उन विचारों से दूरी बनाना मुश्किल हो सकता है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर एक जैसी सामग्री बारबार सामने आने से किसी एक नजरिए की पकड़ और मजबूत हो सकती है।
चरमपंथी समूहों के भर्ती करने वाले लोग ऐसी स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं और व्यक्ति को लगातार एक ही तरह के संदेशों के संपर्क में रख सकते हैं।
व्यवस्था और स्पष्ट जवाब भी हो सकते हैं आकर्षण का कारण
ऑटिज्म से प्रभावित कुछ लोग स्पष्ट दिनचर्या, निरंतरता और पूर्वानुमेय माहौल को पसंद कर सकते हैं। इसके उलट, दुनिया की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां कई बार जटिल और अप्रत्याशित होती हैं।
चरमपंथी विचारधाराएं ऐसी जटिल समस्याओं के आसान और दोटूक जवाब पेश कर सकती हैं। कुछ समूह खुद को व्यवस्थित और अनुशासित समुदाय के रूप में प्रस्तुत करते हैं तथा अपने सदस्यों के लिए स्पष्ट नियम और विचारधारा तय करते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक यह ढांचा सिर्फ ऑटिज्म से प्रभावित लोगों को ही नहीं, बल्कि दूसरे लोगों को भी आकर्षित कर सकता है। हालांकि, निश्चितता और व्यवस्था की अधिक जरूरत महसूस करने वाले कुछ लोगों के लिए यह ढांचा विशेष रूप से आकर्षक हो सकता है।
असली मुद्दा ऑटिज्म नहीं, सामाजिक परिस्थितियां भी
विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि ऑटिज्म से प्रभावित अधिकांश लोग चरमपंथ की ओर आकर्षित नहीं होते। इसलिए केवल ऑटिज्म से जुड़े लक्षणों को जोखिम का कारण मानना सही तस्वीर नहीं देता।
ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों और युवाओं को कई बार सामाजिक बहिष्कार, अकेलेपन और सहयोग की कमी का सामना करना पड़ता है। ऑटिज्म को लेकर बनी रूढ़िवादी सोच और गलतफहमियां भी सामाजिक दूरी बढ़ा सकती हैं।
ऐसी परिस्थितियों में कुछ लोगों के भीतर यह भावना पैदा हो सकती है कि उन्हें स्वीकार नहीं किया जाता, वे अकेले हैं या उनके पास परिस्थितियों को बदलने की शक्ति नहीं है। चरमपंथी समूह इसके उलट उन्हें एक ऐसे समुदाय का हिस्सा बनने का संदेश दे सकते हैं, जहां उन्हें स्वीकार किए जाने और अपनी ताकत वापस पाने का एहसास कराया जाए।
सही सहयोग से कम हो सकता है जोखिम
कुछ शुरुआती प्रमाण बताते हैं कि जोखिम का सामना कर रहे ऑटिज्म से प्रभावित युवाओं को लक्षित और उचित सहायता देने से उनके सामाजिक संबंध मजबूत हो सकते हैं और उन्हें चरमपंथी विचारों से दूरी बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस क्षेत्र में अभी और शोध की जरूरत है।
विशेषज्ञों के मुताबिक यदि मातापिता अपने बच्चे की ऑनलाइन गतिविधियों या बदलते व्यवहार को लेकर चिंतित हैं, तो उनसे बातचीत का रास्ता खुला रखना महत्वपूर्ण है। मजाक उड़ाने, अपमानित करने या सीधे टकराव की बजाय भरोसे और संवाद का माहौल बनाए रखना मददगार हो सकता है।
ः



