
धीरेंद्र सिंह, लखनऊ, अमृत विचार: उत्तर प्रदेश में लाखों आउटसोर्स कर्मियों की सेवा व्यवस्था बदलने की तैयारी अब निर्णायक दौर में पहुंच गई है। सरकार ने आउटसोर्स कर्मियों के लिए अलग निगम बनाकर भर्ती से लेकर भुगतान तक की व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की पहल की है। इसी बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया आदेश ने समान काम के लिए समान वेतन और सेवा शर्तों का सवाल फिर सामने ला दिया है। ऐसे में अब नजर इस बात पर है कि योगी सरकार समान प्रकृति का काम करने वाले आउटसोर्स कर्मियों के लिए न्यूनतम मानदेय कितना तय करती है और वेतन विसंगति दूर करने की दिशा में क्या व्यवस्था करती है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बुधवार को लोकभवन में आउटसोर्स कर्मियों के लिए बड़ी घोषणा करने जा रहे हैं। इसी कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम का लोगो जारी करने के साथ वेबसाइट और पोर्टल की शुरुआत होगी। हालांकि आउटसोर्स कर्मियों के लिए असली बदलाव निगम के लोगो और पोर्टल के उद्घाटन से नहीं आएगा। इसकी असली कसौटी यह होगी कि कर्मचारियों को समय पर कितना मानदेय मिलता है, न्यूनतम मानदेय कितना तय होता है, ईपीएफईएसआईसी की सुविधा कितनी प्रभावी ढंग से सुनिश्चित होती है और समान काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन में अंतर किस हद तक कम होता है। 30 अगस्त को सामने आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में मिर्जापुर के मंडलीय जिला अस्पताल में आउटसोर्सिंग पर कार्यरत स्टाफ नर्सों के मामले में सरकार को उनके प्रत्यावेदन पर 12 सप्ताह के भीतर विधि सम्मत निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है। याचिकाकर्ताओं ने नियमित कर्मचारियों के समान वेतन, वेतन विसंगति दूर करने और सेवा संबंधी मांगों को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था। यह आदेश प्रदेश के सभी आउटसोर्स कर्मचारियों को समान वेतन देने का सीधा निर्देश नहीं है, लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट है कि आउटसोर्स व्यवस्था में वेतन असमानता और सेवा सुरक्षा का सवाल अब न्यायिक स्तर पर भी गंभीरता से उठ रहा है।
पिछले साल सामने आई नई व्यवस्था में आउटसोर्स कर्मियों को अलगअलग श्रेणियों में बांटकर न्यूनतम मानदेय तय करने का खाका तैयार किया गया था। विभिन्न श्रेणियों के लिए करीब 18 हजार से 40 हजार रुपये तक के मानदेय की व्यवस्था सामने आई थी। तकनीकी और विशेषज्ञ श्रेणी के पदों के लिए अधिक मानदेय प्रस्तावित था। हालांकि बुधवार को मुख्यमंत्री की घोषणा से ही स्पष्ट होगा कि नई दरें किन श्रेणियों पर और कितने कर्मचारियों पर लागू होंगी।
2025 में कैबिनेट से शुरू हुई थी कवायद
आउटसोर्स कर्मियों की नई व्यवस्था की नींव सितंबर 2025 में रखी गई थी। योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम के गठन को मंजूरी दी थी। बाद में इसका शासनादेश भी जारी हुआ। निगम के जरिये सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग से लगाए जाने वाले कर्मचारियों की भर्ती, पारिश्रमिक, ईपीएफ, ईएसआईसी और आरक्षण संबंधी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की योजना है। नई व्यवस्था में न्यूनतम पारिश्रमिक को आधार मानकर समयसमय पर संशोधन का प्रावधान भी रखा गया है। वहीं, जिन कर्मियों को निर्धारित न्यूनतम से अधिक भुगतान मिल रहा है, उनके पारिश्रमिक को बनाए रखने की व्यवस्था का भी प्रावधान है।
एजेंसी और कर्मचारी के बीच बदलेगा समीकरण
नई व्यवस्था में आउटसोर्स कर्मचारी और सरकारी विभाग के बीच मौजूदा एजेंसी आधारित व्यवस्था को अधिक संस्थागत स्वरूप देने की कोशिश है। इससे समय पर भुगतान, ईपीएफईएसआईसी और एजेंसियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की उम्मीद है। निगम के पोर्टल के जरिये भी भुगतान और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं की निगरानी को अधिक पारदर्शी बनाने की योजना है।
पांच प्रतिशत बढ़ोतरी के बाद भी बड़ा सवाल
विभिन्न विभागों में आउटसोर्स कर्मियों के मानदेय में अलगअलग स्तर पर बढ़ोतरी होती रही है। परिवहन निगम ने अगस्त में कंप्यूटर ऑपरेटर, लेखाकारकमटैली ऑपरेटर और प्रोग्रामर के मानदेय में पांच प्रतिशत वृद्धि की थी। इससे साफ है कि अभी विभागवार भुगतान व्यवस्था में अंतर है। नया निगम इसी बिखरी व्यवस्था को एक समान ढांचे में लाने की कोशिश है। अब बुधवार की घोषणा से यह तय होगा कि सरकार न्यूनतम मानदेय, समान काम के बदले वेतन और सामाजिक सुरक्षा के सवालों का कितना ठोस समाधान पेश करती है।
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