जिस देश में आज चाय से लेकर कार तक की पेमेंट QR Code स्कैन करके हो रही है, जहां UPI ने कैश निकालने और छुट्टे पैसे रखने की जरूरत काफी हद तक कम कर दी है, वहीं अब एक ऐसा फैसला आया है, जिसने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है. अगर 2000 से ऊपर UPI भुगतान पर MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट लगा, तो क्या व्यापारी और ग्राहक फिर से कैश को ज्यादा पसंद करने लगेंगे? और अगर ऐसा हुआ तो क्या इसका असर सिर्फ आपकी जेब पर नहीं, बल्कि देश में चल रही कुल नकदी, नोटों की मांग और RBI के नोट छापने के खर्च पर भी पड़ेगा?

यही बड़ा सवाल है. मान लीजिए कोई व्यापारी हर महीने बड़ी रकम के UPI पेमेंट लेता है. अगर उसे डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने की लागत बढ़ती है, तो उसके सामने कुछ विकल्प हो सकते हैं. पहला, वह लागत खुद वहन करे. दूसरा, वह अपनी कीमत में इसका असर शामिल करे. तीसरा, कुछ मामलों में वह ग्राहक पर कैश के लिए दबाव डाले.
MDR के साथ मैक्रोइकोनॉमिक सवाल
यही वजह है कि UPI पर MDR के साथ एक बड़ा मैक्रोइकोनॉमिक सवाल भी उठ रहा है. क्या डिजिटल पेमेंट पर लागत बढ़ने से नकदी की मांग और बढ़ सकती है? लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी है. यह अभी अनुमान है, स्थापित तथ्य नहीं.
UPI पर MDR लगने का मतलब यह अपने आप नहीं है कि भारत में लोग बड़ी संख्या में कैश की तरफ लौट जाएंगे. इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि व्यापारी, ग्राहक और पेमेंट इकोसिस्टम इस लागत को किस तरह एब्जॉर्ब करते हैं.
अब देखिए RBI का डेटा क्या कहता है. RBI ने 25 सितंबर 2026 को मनी स्टॉक डेटा जारी किया है. इसमें Currency with the Public कॉलम में आरबीआई ने ये बताया है कि चलन में मौजूद कुल करेंसी में से बैंकों के पास मौजूद कैश को निकालने के बाद जनता के पास कितनी नकदी मौजूद है. यानी आसान भाषा में लोगों और कारोबारियों के हाथ में कितना कैश घूम रहा है.
जनता के पास कितना कैश मौजूद?
इस आंकड़े को ध्यान से समझिए. आरबीआई के इस टेबल के मुताबिक 31 मार्च 2026 को Currency with the Public यानी जनता के पास ₹40 लाख 65,488 करोड़ कैश मौजूद था. जबकि 15 सितंबर 2026 तक RBI के मुताबिक ये आंकड़ा बढ़कर 42 लाख 10,170 करोड़ हो गया. उसके साढ़े 5 महीने बाद यानी जनता के पास मौजूद नकदी में करीब 1 लाख 45 हजार करोड़ की बढ़ोतरी हो गई. औसत निकाले तो ये 3.6 फीसदी की बढ़ोतरी है. यानी साढ़े 5 महीनों में देश के लोगों के पास इतना कैश मौजूद था.
लेकिन अगला आंकड़ा इससे काफी बड़ा है. अगर 15 सितंबर 2026 के इसी आंकड़े को YoY यानी साल दर साल के आधार पर देखें तो 15 सितंबर 2026 तक Currency with the Public में 13.6% की बढ़ोतरी हुई जो वैल्यू में 5लाख 3 हजार करोड़ ज्यादा है. यानी साढ़े पिछले एक साल में देश में लोगों के पास कैश बढ़ा है और ये बढ़ोतरी सालाना आधार पर 13.5 परसेंट है.
यूपीआई बढ़ने के साथसाथ कैश भी बढ़ रहा
कहने का मतलब क्या है? कहने का मतलब है कि UPI लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद जनता के पास मौजूद कैश भी बढ़ रहा है. अब अगला आंकड़ा और ज्यादा अलार्मिंग है. CashtoGDP Ratio यानी अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में भी जनता के पास मौजूद नकदी का अनुपात देश में मौजूदा कैश के चलन का आंकड़ा देता है. मार्च 2026 में यह अनुपात 12.1% था जबकि एक साल पहले ये 11.7% था. यानी पिछले देश में कैश का चनल बढ़ा है. उसकी पुष्टि ये आंकड़ा भी करता है.
अब वापस आते हैं UPI पर एक तरफ UPI का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है. दूसरी तरफ Currency with the Public भी बढ़ रही है. और अब ₹2,000 से ऊपर के कुछ मर्चेंट यूपीआई पेमेंट पर MDR की नई व्यवस्था आने वाली है तो सवाल है कि क्या MDR कैश के इस ट्रेंड को और बढ़ा सकता है? कई एक्सपर्ट इसकी संभावना जता रहे हैं. उनके मुताबिक बड़े व्यापारी या पेट्रोल पंप पर ग्राहकों पर यूपीआई के बदले किसी और मोड के जरिये पेमेंट करने को कहा जा सकता है जिसमें कैश भी शामिल है। लेकिन इसका सही जानने के लिए हमें देखना होगा कि 15 अक्टूबर के बाद लोगों के भुगतना करने के व्यवहार में क्या बदलाव आता है.
किसमें कितना खर्च?
इसका एक पहलू नोट छापने के खर्च से भी जुड़ा है. अगर 1 लाख रुपए को आधार बनाएं तो यूपीआई पर 1 लाख रुपए के ट्रांजैक्शन की अनुमानित ऑपरेशनल कॉस्ट करीब 66 रुपए बैठती है. जबकि अगर यहीं 1 लाख रुपए 500 के नोट में छापे जाएं तो RBI के उपलब्ध आंकड़ों में ₹500 नोट की प्रिंटिंग कास्ट करीब ₹0.96 प्रति नोट बताई गई है. जिसके आधार पर ये खर्च 192 रुपए बैठता है. ये केवल प्रिंटिंग कॉस्ट है. इसके बाद transportation, security, cash handling, sorting, ATM/cash infrastructure, इन सबका खर्च जोड़ें तो ये कहीं ज्यादा बैठेगा.
एक लाइन में कहें तो यूपीआई के बदले कैश का खर्च कई गुना ज्यादा है. और अगर कैश का चलन बढ़ेगा तो सरकार का खर्च बढ़ सकता है. तो यहीं पर आकर पूरी कहानी सिमटती है. शुरुआत में हमने सवाल पूछा था, क्या UPI पर चार्ज लगने से देश में CASH का चलन बढ़ जाएगा? अभी इसका जवाब निश्चित नहीं है, लेकिन कुछ चीजें एक साथ जरूर दिखाई दे रही हैं.
बढ़ सकता है सरकारी खर्च
UPI भारत में डिजिटल पेमेंट का बड़ा माध्यम बन चुका है. इसके बावजूद जनता के पास मौजूद करेंसी बढ़ रही है. लोगों में कैश का चलन बढ़ा है. लोग ज्यादा कैश अपने पास रख रहे हैं. देश की इकोनॉमी में कैश बढ़ा है और जब ये बैंको के जरिये सरकार के पास आएगा तो इसको संभालने और मांग बढ़ने पर नए नोट छापने पर सरकार का खर्च भी बढ़ सकता है.
अब ये सब 15 अक्टूबर के बाद पता चलेगा जब इन सवालों का जवाब मिलेगा कि क्या डिजिटल पेमेंट की लागत बढ़ने पर भारत के लोग और व्यापारी अपने payment behaviour में बदलाव करेंगे? और अगर करेंगे तो क्या उसका असर सिर्फ दुकानदार और ग्राहक पर होगा? या फिर RBI के Currency in Circulation, Cash Demand और नोट छपाई की पूरी अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देगा?



