CrimeIndiaTrending

जीरो एफआईआर क्या होती है? ‘केरल में दिल्ली पुलिस के खिलाफ दर्ज हुई शिकायत, जानिए कब और कैसे आती है काम

जीरो एफआईआर क्या होती है? ‘केरल में दिल्ली पुलिस के खिलाफ दर्ज हुई शिकायत, जानिए कब और कैसे आती है काम

केरल: किसी अपराध की शिकायत दर्ज कराने के लिए पीड़ित को उसी शहर या थाने तक पहुंचना जरूरी नहीं है, जहां घटना हुई हो। ऐसी स्थिति में जीरो एफआईआर की व्यवस्था मददगार साबित होती है। केरल में एनएसयूआई की महिला कार्यकर्ता की शिकायत पर दिल्ली पुलिस के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज किए जाने का मामला सामने आया है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान उनके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई। इस मामले ने एक बार फिर जीरो एफआईआर और उससे जुड़े कानूनी अधिकारों को चर्चा में ला दिया है।

केरल में क्या है पूरा मामला?

जानकारी के मुताबिक, एनएसयूआई कार्यकर्ता अथिरा सी ने आरोप लगाया कि दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन करते समय दिल्ली पुलिस के कर्मियों ने उनके साथ कथित मारपीट की। इसके बाद उन्होंने केरल लौटकर राज्य के पुलिस महानिदेशक के समक्ष लिखित शिकायत दी।

शिकायत के आधार पर केरल पुलिस ने जीरो एफआईआर दर्ज की। चूंकि कथित घटना दिल्ली में हुई थी, इसलिए मामले को आगे की जांच और कानूनी कार्रवाई के लिए संबंधित पुलिस थाने को भेजने की प्रक्रिया अपनाई गई। हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

क्या होती है जीरो एफआईआर?

जीरो एफआईआर पुलिस में शिकायत दर्ज करने की एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत किसी अपराध की सूचना देश के किसी भी पुलिस थाने में दी जा सकती है, भले ही घटना उस थाने के अधिकार क्षेत्र में न हुई हो।

सामान्य तौर पर अपराध जिस इलाके में होता है, उससे संबंधित थाने में एफआईआर दर्ज की जाती है। लेकिन यदि पीड़ित किसी दूसरे शहर या राज्य में है, तो उसे केवल क्षेत्राधिकार का हवाला देकर शिकायत दर्ज कराने से नहीं रोका जाना चाहिए। ऐसे मामलों में पुलिस जीरो एफआईआर दर्ज कर सकती है और बाद में उसे संबंधित थाने को भेज सकती है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि पीड़ित को शिकायत दर्ज कराने के लिए एक थाने से दूसरे थाने के चक्कर न लगाने पड़ें और शुरुआती पुलिस कार्रवाई में अनावश्यक देरी न हो।

इसे जीरो एफआईआर क्यों कहा जाता है?

जीरो एफआईआर में शुरुआत में नियमित एफआईआर नंबर के स्थान पर शून्य यानी 0 दर्ज किया जाता है। इससे पता चलता है कि शिकायत ऐसे थाने में दर्ज हुई है, जिसके क्षेत्र में कथित अपराध नहीं हुआ।

इसके बाद शिकायत और संबंधित दस्तावेज उस थाने को भेजे जाते हैं, जिसके अधिकार क्षेत्र में घटना हुई थी। वहां आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने पर उसे नियमित एफआईआर नंबर दिया जाता है और मामले की जांच आगे बढ़ाई जाती है।

सामान्य एफआईआर और जीरो एफआईआर में क्या अंतर है?

सामान्य एफआईआर आमतौर पर उस पुलिस थाने में दर्ज होती है, जिसके क्षेत्र में अपराध हुआ है। वहीं, जीरो एफआईआर किसी दूसरे क्षेत्र के पुलिस थाने में भी दर्ज कराई जा सकती है।

दोनों का उद्देश्य अपराध की सूचना पुलिस के रिकॉर्ड में लाना और कानून के अनुसार कार्रवाई शुरू करना है। इनमें मुख्य अंतर शिकायत दर्ज करने के शुरुआती स्थान और उसे संबंधित थाने तक भेजने की प्रक्रिया का है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि जीरो एफआईआर दर्ज होने का मतलब यह नहीं है कि शिकायत में लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं। आरोपों की जांच और आगे की कार्रवाई कानून के अनुसार होती है।

किन मामलों में काम आती है जीरो एफआईआर?

जीरो एफआईआर उन परिस्थितियों में विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है, जब पीड़ित घटना वाले शहर या जिले से दूर हो और उसे जल्द पुलिस सहायता की जरूरत हो। यह व्यवस्था गंभीर अपराधों सहित उन मामलों में महत्वपूर्ण है, जहां शिकायत दर्ज कराने में देरी से पीड़ित को नुकसान पहुंच सकता है।

  • महिलाओं के खिलाफ अपराध: यौन उत्पीड़न या अन्य गंभीर आरोपों की शिकायत दर्ज कराने में मदद मिल सकती है।
  • गंभीर मारपीट: दूसरे शहर में मौजूद पीड़ित अपने नजदीकी थाने में शिकायत दे सकता है।
  • अपहरण जैसे गंभीर मामले: तत्काल सूचना दर्ज कराकर पुलिस कार्रवाई शुरू कराने में मदद मिलती है।
  • दूसरे राज्य में हुई घटना: घटना के बाद अपने गृह क्षेत्र में लौटे व्यक्ति के लिए शिकायत दर्ज कराना आसान हो सकता है।

जीरो एफआईआर की व्यवस्था क्यों जरूरी है?

कई बार पीड़ित घटना के बाद दूसरे शहर या राज्य में पहुंच जाता है। ऐसी स्थिति में उसे केवल इस वजह से शिकायत दर्ज कराने में परेशानी नहीं होनी चाहिए कि घटना किसी दूसरे थाने के क्षेत्र में हुई थी।

जीरो एफआईआर का उद्देश्य क्षेत्राधिकार से जुड़ी शुरुआती बाधा को दूर करना और शिकायत पर समय रहते कार्रवाई सुनिश्चित करना है। यह व्यवस्था पुलिस को सूचना दर्ज करने का रास्ता देती है, जबकि मामले की जांच संबंधित क्षेत्र का थाना आगे बढ़ाता है।

निर्भया मामले के बाद बढ़ी कानूनी चर्चा

दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया मामले के बाद महिलाओं की सुरक्षा और पुलिस की जवाबदेही को लेकर देशभर में व्यापक चर्चा हुई थी। इसके बाद आपराधिक कानूनों में कई बदलाव किए गए। वर्ष 2013 के आपराधिक कानून संशोधन ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े प्रावधानों में महत्वपूर्ण बदलाव किए।

हालांकि, जीरो एफआईआर की अवधारणा को केवल इसी संशोधन से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। इसका मूल उद्देश्य क्षेत्राधिकार की बाधा के बावजूद शिकायत दर्ज कराने की सुविधा देना है। मौजूदा आपराधिक प्रक्रिया के तहत भी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार पुलिस को कार्रवाई करनी होती है।

सत्य रिपोर्ट की जानकारी: जीरो एफआईआर पीड़ितों को शिकायत दर्ज कराने में क्षेत्राधिकार से जुड़ी परेशानी से राहत देने वाली व्यवस्था है। केरल में दर्ज मामले में लगाए गए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जाएगा।

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply