
रात के आसमान में चमकते ग्रहों को देखकर शायद ही कभी किसी के मन में यह सवाल आया हो कि आखिर ग्रहों का आकार गोल क्यों होता है? क्या वे चौकोर, त्रिकोण या पिरामिड जैसे भी हो सकते थे? इसका जवाब सीधे तौर पर गुरुत्वाकर्षण (Gravity) से जुड़ा है।
सौरमंडल के सभी ग्रह आकार और संरचना में एक-दूसरे से काफी अलग हैं। कोई चट्टानी है तो कोई गैसों से बना विशाल ग्रह। इसके बावजूद इन सभी में एक समानता है—ये सभी लगभग गोलाकार हैं। इसके पीछे ग्रह का अपना गुरुत्वाकर्षण सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।
कैसे बनते हैं ग्रह?
ग्रहों के बनने की प्रक्रिया में अंतरिक्ष में मौजूद धूल, गैस और छोटे-छोटे चट्टानी टुकड़े धीरे-धीरे एक-दूसरे से टकराकर जुड़ते हैं। समय के साथ जब इन पदार्थों की मात्रा बढ़ती जाती है, तो उनका गुरुत्वाकर्षण भी मजबूत होने लगता है।
एक समय ऐसा आता है जब यह गुरुत्वाकर्षण आसपास मौजूद दूसरे पदार्थों को अपनी ओर खींचने लगता है। इस तरह ग्रह का आकार लगातार बढ़ता जाता है और वह अपने आसपास के क्षेत्र में मौजूद काफी मात्रा में पदार्थ को भी आकर्षित कर लेता है।
गुरुत्वाकर्षण ग्रह को गोल कैसे बनाता है?
किसी बड़े खगोलीय पिंड में गुरुत्वाकर्षण उसके केंद्र से हर दिशा में पदार्थ को अपनी ओर खींचता है। जब किसी ग्रह का आकार काफी बड़ा हो जाता है, तो यह खिंचाव उसकी सतह को अधिक समान रूप में ढालने लगता है।
मान लीजिए ग्रह की सतह पर कहीं कोई हिस्सा बहुत ज्यादा बाहर निकला हुआ है। गुरुत्वाकर्षण उस अतिरिक्त पदार्थ को धीरे-धीरे अंदर की ओर खींचने की कोशिश करेगा। इसी तरह ग्रह के अलग-अलग हिस्सों पर गुरुत्वाकर्षण का असर पड़ता रहता है।
लंबे समय तक चलने वाली इस प्रक्रिया का परिणाम एक ऐसा आकार होता है जो लगभग गोल दिखाई देता है।
यही कारण है कि किसी बड़े ग्रह का लंबे समय तक क्यूब या पिरामिड जैसे कोणीय आकार में बने रहना स्वाभाविक नहीं है। गुरुत्वाकर्षण ऐसे उभरे हुए कोनों और किनारों को समतल करने की दिशा में काम करता है।
क्या सभी ग्रह बिल्कुल गोल होते हैं?
यह कहना सही नहीं होगा कि हर ग्रह पूरी तरह परफेक्ट गेंद की तरह गोल है। वास्तव में ज्यादातर ग्रह लगभग गोलाकार होते हैं, लेकिन उनके घूमने की गति के कारण उनमें थोड़ा बदलाव आ जाता है।
बुध और शुक्र अपेक्षाकृत ज्यादा गोलाकार ग्रह हैं। वहीं बृहस्पति और शनि जैसे तेजी से घूमने वाले ग्रह अपने ध्रुवों के पास कुछ चपटे दिखाई देते हैं।
इसका कारण उनकी तेज घूर्णन गति है।
तेजी से घूमने पर ग्रह क्यों चपटा हो जाता है?
जब कोई ग्रह अपनी धुरी पर घूमता है, तो उसकी भूमध्य रेखा के आसपास का हिस्सा बाहर की ओर उभरने लगता है। इसे इक्वेटोरियल बल्ज यानी भूमध्यरेखीय उभार कहा जाता है।
सरल शब्दों में समझें तो ग्रह का गुरुत्वाकर्षण पदार्थ को केंद्र की ओर खींचता है, जबकि घूर्णन के कारण भूमध्य रेखा के आसपास बाहर की ओर प्रभाव पैदा होता है। दोनों के बीच संतुलन बनने से ग्रह पूरी तरह गोल न रहकर थोड़ा चपटा हो जाता है।
शनि सबसे ज्यादा चपटा ग्रहों में से एक
सौरमंडल में शनि का भूमध्यरेखीय उभार काफी ज्यादा है। इसकी भूमध्यरेखीय चौड़ाई ध्रुवों के बीच की चौड़ाई से लगभग 10.7 फीसदी अधिक है।
बृहस्पति में यह अंतर करीब 6.9 फीसदी है। इसलिए दोनों ग्रहों को पूरी तरह गोल गेंद की बजाय थोड़ा चपटे आकार के रूप में समझना ज्यादा सही होगा।
दूसरी ओर पृथ्वी और मंगल अपेक्षाकृत छोटे और धीमी गति से घूमने वाले ग्रह हैं, इसलिए उनमें यह प्रभाव काफी कम दिखाई देता है। पृथ्वी की भूमध्यरेखीय चौड़ाई ध्रुवीय चौड़ाई से करीब 0.3 फीसदी ज्यादा है, जबकि मंगल में यह अंतर लगभग 0.6 फीसदी है।
यूरेनस और नेपच्यून में भी घूर्णन के कारण कुछ चपटापन मौजूद है।
आखिर चौकोर ग्रह क्यों नहीं बनते?
किसी ग्रह का चौकोर या पिरामिड जैसा आकार बनाए रखने के लिए उसके कोनों और किनारों को लंबे समय तक अपनी जगह पर टिके रहना होगा। लेकिन बड़े खगोलीय पिंडों में गुरुत्वाकर्षण लगातार पदार्थ को उनके केंद्र की ओर खींचता रहता है।
इसलिए जैसे-जैसे ग्रह पर्याप्त बड़ा और भारी होता जाता है, गुरुत्वाकर्षण उसके अनियमित हिस्सों को कम करता जाता है और आकार लगभग गोल हो जाता है।
यानी ग्रहों के गोल होने की वजह यह नहीं है कि अंतरिक्ष में हर चीज स्वाभाविक रूप से गेंद जैसी होती है, बल्कि ग्रह के विशाल आकार और उसके गुरुत्वाकर्षण का लंबे समय तक चलने वाला प्रभाव इसका मुख्य कारण है।
छोटे अंतरिक्ष पिंड, जैसे कई क्षुद्रग्रह, इस नियम का अलग रूप दिखाते हैं। उनका गुरुत्वाकर्षण इतना मजबूत नहीं होता कि वे अपनी पूरी सतह को गोलाकार बना सकें। इसलिए वे अक्सर टेढ़े-मेढ़े और अनियमित आकार के दिखाई देते हैं।



