
उत्तर प्रदेश में एक ऐसा गांव है, जहां रहने वाले लोगों की पहचान उनके अनोखे सरनेम से होती है। यहां किसी के नाम के साथ तोता जुड़ा है तो किसी के साथ चिड़िया, गिलहरी, बकरी या बंदर। सुनने में भले ही ये बात अजीब लगे, लेकिन गांव में आज भी इस तरह के नामों का इस्तेमाल किया जाता है।
दरअसल, यह अनोखा गांव बागपत जिले में स्थित है। गांव की एक और खासियत है कि यहां रहने वाले लोगों के घरों का पता अक्सर उनके नाम से नहीं, बल्कि उनकी पुरानी हवेलियों से लगाया जाता है। यही वजह है कि इसे हवेलियों वाले गांव के तौर पर भी जाना जाता है।
करीब 250 साल पुराना है गांव का इतिहास
बताया जाता है कि इस गांव में करीब ढाई सौ साल पहले हवेलियां बनाने का सिलसिला शुरू हुआ था। धीरे-धीरे यहां बड़ी संख्या में भव्य हवेलियां तैयार हुईं और गांव की अलग पहचान बन गई।
एक समय गांव में 50 से ज्यादा हवेलियां हुआ करती थीं। समय के साथ कई परिवार अपनी पुरानी हवेलियां छोड़कर शहरों में जाकर बस गए, लेकिन आज भी कुछ परिवार इन ऐतिहासिक हवेलियों में रहते हैं।
इन हवेलियों के निर्माण के लिए उस दौर में गांव के आसपास भट्ठियां भी तैयार कराई गई थीं। पुराने समय की इन इमारतों और उनकी बनावट की वजह से गांव की पहचान आसपास के इलाकों में भी अलग रही है।
गांव में मौजूद हैं कई पुराने मंदिर
यह गांव सिर्फ अपनी हवेलियों के लिए ही मशहूर नहीं है। यहां कई पुराने मंदिर भी मौजूद हैं। गांव में करीब 11 ऐतिहासिक मंदिर बताए जाते हैं, जहां स्थानीय लोगों के साथ आसपास के इलाकों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।
पुराने मंदिरों और हवेलियों की वजह से इस गांव का ऐतिहासिक महत्व भी काफी खास माना जाता है।
सबसे ज्यादा चर्चा इन अजीब सरनेम की
लेकिन गांव की सबसे दिलचस्प बात यहां इस्तेमाल किए जाने वाले सरनेम हैं। यहां लंबे समय से पशु-पक्षियों के नामों को लोगों की पहचान के तौर पर इस्तेमाल करने की परंपरा चली आ रही है।
किसी व्यक्ति के नाम के साथ तोता लिखा मिल सकता है, तो किसी के साथ चिड़िया। वहीं गिलहरी, बकरी और बंदर जैसे नाम भी लोगों की पहचान का हिस्सा हैं।
खास बात यह है कि ये केवल बोलचाल तक सीमित नहीं हैं। बताया जाता है कि अगर गांव में किसी व्यक्ति के नाम कोई चिट्ठी या सामान आता है तो उसके नाम के साथ यही पारंपरिक सरनेम लिखा जाता है।
यही अनोखी परंपरा इस गांव को बाकी गांवों से अलग बनाती है। गांव की पुरानी हवेलियां, ऐतिहासिक मंदिर और पशु-पक्षियों से जुड़े सरनेम आज भी यहां की अलग पहचान को कायम रखे हुए हैं।



