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 23 साल का लंबा संघर्ष, उम्रकैद और फिर रिहाई; जानिए महेंद्र सिंह भाटी हत्याकांड की पूरी इनसाइड स्टोरी..

 23 साल का लंबा संघर्ष, उम्रकैद और फिर रिहाई; जानिए महेंद्र सिंह भाटी हत्याकांड की पूरी इनसाइड स्टोरी..

कद्दावर गूर्जर नेता महेंद्र सिंह भाटी के ऊपर ग्रेटर नोएडा की एक रेलवे क्रॉसिंग पर AK-47 से ताबड़तोड़ फायरिंग हुई थी.  13 सितंबर 1992 के गोलीकांड में भाटी के साथ उदय आर्य की भी जान चली गई. पर हैरानी कि बात यह है कि आरोपी MLA भाटी का सबसे करीबी था जो राजनीति के चक्कर में जानी दुऱ्मन बन गया था.

यह कहानी 90 के दशक के सबसे बड़े गोलीकांड की जिसने उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारे में कोहराम मचा दिया था. तारीख थी- 13 सितंबर 1992. जगह- गाजियाबाद का दादरी रेलवे क्रॉसिंग. सर्दियों की शाम चारों ओर धुंध थी होने लगी थी. कुछ ही देर में गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा इलाका गूंज उठा. यह कोई साधारण हमला नहीं था. यूपी की राजनीति में पहली बार सरेआम AK-47 गरज रही थी. निशाना थे दादरी के तत्कालीन जनता दल विधायक महेंद्र सिंह भाटी. हमलावरों ने उनकी गाड़ी पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं जिसमें कद्दावर नेता भाटी और उनके साथी उदय आर्य मौके पर ही चल बसे. हैरानी की बात यह है कि गोलीकांड के पीछे कई प्रभावशाली लोगों का हाथ था. इनमें से कुछ तो महेंद्र सिंह भाटी के खास थे. लेकिन विवाद किस बात का था और ऐसा क्या हुआ कि एक समय पर सबसे करीबी रहे राजनीतिक साथी एक-दूसरे के जानी-दुश्मन बन गए.

यूपी की राजनीति का काला दिन

13 सितंबर 1992 शाम के करीब 6 बजे दादरी के बाहुबली और कद्दावर विधायक महेंद्र सिंह भाटी के घर पर फोन बजता है. बात कुछ ऐसी थी कि भाटी अपने साथी उदय प्रकाश आर्य को साथ लेकर नोएड़ा के लिए निकल जाते हैं. गाड़ी में सुरक्षाकर्मी कौशिक और ड्राइवर देवेंद्र भी मौजूद होते हैं. इधर रेलवे क्रॉसिंग पर हमलावर घात लगाए बैठे थे. जैसे ही गाड़ी भंगेल रोड पहुंचती है तो रेलवे फाटक बंद मिलता है. सामने खड़ी गाड़ियां अचानक घेराबंदी करके तड़ातड़ AK-47 से गोलियों की बौछार करने लगते हैं. इस खूनी संघर्ष में विधायक महेंद्र सिंह भाटी और उनके साथी उदय आर्य की मौके पर ही मौत हो जाती है. सुरक्षाकर्मी कौशिक लहूलुहान हो जाता है और ड्राइवर भी रेंगते हुए फरार हो जाता है.

जब दोस्त बना जानी दुश्मन

महेंद्र भाटी पर हुआ गोलीकांड कोई साधारण मर्डर नहीं था. यह एक सोची-समझी साजिश थी जिसके रचियता भाटी के ही करीबी बताए जाते हैं. यह बात है 80 के दशक की. जब महेंद्र सिंह भाटी का पश्चिमी यूपी में सिक्का चलता था. नोएड़ा का विकास हो रहा था. भूमि अधिग्रहण आंदोलन में बाटी अहम भूमिका निभा रहे थे और फैक्ट्रियों में रोजगार दिलवाने के चलते भाटी अब युवाओं के अतिप्रिय बन चुके थे. इसी दौरान भाटी की मुलाकात नोएडा के सर्फाबाद गांव का निवासी धर्मपाल यादव उर्फ डीपी यादव से हुई. डीपी यादव दूध के व्यापारी थे. शराब के धंधे में उतर चुके थे. गौतमबुद्ध नगर और गाजियाबाद में जहरीली शराब कांड मामले में फंसे हुए थे. राजनीतिक संरक्षण के लिए इलाके सबसे ताकतवर नेता भाटी से मिले और जल्द यही मिलना-जुलना दोस्ती में तब्दील हो गया.

जब सियायत में उतरे डीपी डादव

जहरीली शराब कांड के बाद विधायक महेंद्र सिंह भाटी की छत्रछांव में रहने वाले डीपी यादव पर सियासत में कदम रखना चाहते थे. महेंद्र सिंह भाटी ने डीपी यादव का हाथ थामा. पहले बिसरख का ब्लॉक प्रमुख बनवाया. फिर 1989 में बुलंदशहर से टिकट दिलाकर चुनाव में विजय दिलवाई. फिर तो डीपी यादव खुलेआम भाटी को अपना ‘राजनीतिक गुरु’ कहने लगे. लेकिन राजनीति दोस्ती का बने रहना मुश्किल हो जाता है. 

कहां से मिली दुश्मनी को हवा

यह बात है 1990 की मुलायम सिंह यादव और चौधरी अजित सिंह के रास्ते अलग हो गए तो डीपी यादव मुलायम के वफादार बन गए. वहीं महेंद्र सिंह भाटी ने अजित सिंह का साथ चुना. पाला बदलते ही डीपी यादव मंत्री की कुर्सी पर पहुंच गए. दोनों के बीच यही से मतभेद की शुरुआत हुई. अब दोनों के विचार दोस्तों वाले नहीं रही. बीच में राजनीतिक वर्चस्व और पावर ने बड़ी दूरियां बना दी थीं. डीपी यादव अपने इलाके में पूरा दबदबा चाहते थे जबकि वहां महेंद्र सिंह भाटी के पांव मजबूती से जमे हुए थे. दोनों ने एक दूसरे के इलाके को भेदने की कोशिश की लेकिन दोनों में से कोई सफल नहीं हो पाया.

1991 के विधानसभा चुनाव में महेंद्र सिंह भाटी ने बुलंदशहर सीट से डीपी यादव के खिलाफ पतवाड़ी गांव के प्रकाश पहलवान को जनता दल के टिकट पर चुनाव में खड़ा किया. खूब विवाद हुआ लेकिन डीपी यादव जीत गए, इधर महेंद्र सिंह भाटी तीसरी बार विधायक बन गए. दोनों के बीच रंजिश इतनी बढ़ गई कि पहले महेंद्र भाटी के भाई की हत्या हुई और इल्जाम लगा  डीपी यादव के साले परमानंद यादव पर. दोनों एक-दूसरे पर हावी रहते थे जिसका जिक्र महेंद्र सिंह भाटी ने विधानसभा में भी किया था. लेकिन राजनीतिक कारणों से उन्हें सुरक्षा नहीं मिली और वही हुआ जिसका डर खुद महेंद्र सिंह भाटी को था.

किन-किन लगा आरोप?

महेंद्र सिंह भाटी के सनसनीखेज हत्याकांड के बाद पुलिस और सीबीआई ने कुल 8 लोगों को आरोपी बनाया. इनमें-

  • डीपी यादव (बुलंदशहर के बाहुबली नेता और भाटी के पूर्व चेले)
  • पाल सिंह उर्फ लक्कड़पाला (इलाके का कुख्यात शूटर)
  • करन यादव (डीपी यादव का करीबी)
  • तेजपाल भाटी (गाजियाबाद के बीजेपी नेता प्रवीण भाटी के पिता, जो भाटी से बदला लेना चाहते थे)
  • प्रणीत भाटी (प्रवीण भाटी का भाई)
  • तीन अन्य आरोपी

भाटी के इंसाफ के लिए 23 साल का संघर्ष

यह हाई-प्रोफाइल मर्डर मिस्ट्री किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं रही. तीन दशक तक चली इंसाफ की लड़ाई में एक-एक करके सभी आरोपी बरी होने लगे.

1993: मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच सीबीआई को सौंप दी गई. 
2000: सुप्रीम कोर्ट ने केस को यूपी से देहरादून सीबीआई कोर्ट ट्रांसफर कर दिया ताकि डीपी यादव अपने राजनीतिक रसूख से गवाहों को डरा न सके.
केस के दौरान: लंबी सुनवाई के दौरान ही उम्र के तकाजे या अन्य कारणों से 4 आरोपियों की मौत हो गई.
2015: अदालत में इंसाफ की पहली किरण दिखी और फरवरी 2015 में सीबीआई की विशेष अदालत ने डीपी यादव समेत बचे हुए 4 आरोपियों को उम्रकैद की सख्त सजा सुनाई और जेल भेज दिया.
2021: आरोपी हाईकोर्ट पहुंचे और नवंबर-दिसंबर 2021 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सबूतों की कमी का हवाला देते हुए डीपी यादव, करन यादव, लक्कड़पाला और प्रणीत भाटी को बरी कर दिया.

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