
Rajasthan High Court Judgment 2026: राजस्थान उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवादों और दहेज उत्पीड़न के मामलों को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ लफ्जों में कहा है कि अगर कोई महिला आपसी सहमति से तलाक ले लेती है और बदले में भारी-भरकम गुजारा भत्ता (एलिमनी) भी वसूल कर लेती है, तो उसके बाद भी पूर्व पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मुकदमा जारी रखना सरासर गलत है। हाई कोर्ट ने इसे सीधे तौर पर कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग करार दिया है।
अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि कानूनी और अदालती कार्यवाही को किसी भी बेकसूर व्यक्ति को प्रताड़ित करने का हथियार बनने की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती। न्याय का असली मकसद सिर्फ कानून की किताबों में लिखे शब्दों का अक्षरशः पालन करना ही नहीं है, बल्कि समाज में वास्तविक और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना है, जो कि सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
‘मोटे पैसे ऐंठने के बाद भी मुकदमेबाजी करना चिंताजनक प्रवृत्ति’, कोर्ट ने जताई गहरी नाराजगी
इस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश अनूप कुमार ढंढ की एकल पीठ ने अपने आदेश में आज के समय की एक बेहद चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर इशारा किया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला समाज की उस कड़वी हकीकत को दिखाता है, जहां दोनों पक्षों के बीच आपसी समझौता हो जाने, गुजारा भत्ता की पूरी रकम मिल जाने और कानूनी रूप से विवाह विच्छेद (तलाक) हो जाने के बावजूद शिकायतकर्ता महिला केस वापस नहीं लेती। ऐसी महिलाएं सिर्फ मुकदमे को खींचकर याचिकाकर्ताओं को एक अंतहीन और लंबी कानूनी प्रक्रिया में फंसाए रखती हैं, जिससे उन पर भारी आर्थिक बोझ और मानसिक प्रताड़ना बनी रहती है।
जस्टिस ढंढ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि एक बार जब पत्नी समझौते की सभी शर्तों का पूरा लाभ उठा लेती है, तो उसके बाद वह अदालत में अपने ही घोषित रुख से पीछे नहीं हट सकती। यदि कोई महिला ऐसा कदम उठाती है, तो इसे हर हाल में न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग ही माना जाएगा और कानून ऐसी हरकत को बर्दाश्त नहीं करेगा।
साल 2018 से फंसा था परिवार, खुद गवाही देने तक नहीं आई पत्नी
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ साल 2018 में दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के तहत आरोप तय किए गए थे। इस आपराधिक मुकदमे के लंबित रहने के दौरान ही परेशान पति ने फैमिली कोर्ट में विवाह विच्छेद यानी तलाक की अर्जी दायर कर दी थी, जिसे निचली अदालत ने स्वीकार भी कर लिया था। हालांकि, उस समय पत्नी ने इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे दी थी, जिससे विवाद और बढ़ गया था।
इसके बाद दोनों पक्षों के बड़े-बुजुर्गों ने बीच-बचाव किया और आखिरकार दोनों आपसी समझौते से हमेशा के लिए अलग होने को राजी हो गए। इस समझौते की शर्त के मुताबिक, पति ने अपनी पत्नी को उसके भविष्य और गुजारे के लिए एकमुश्त 20 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) सौंप दिया। इसके बाद दोनों का आपसी सहमति से कानूनी तलाक हो गया।
हाई कोर्ट ने पति और ससुराल वालों पर दर्ज केस को किया जड़ से खारिज
पति और उसके रिश्तेदारों की तरफ से कोर्ट में दलील दे रहे याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि समझौते के तहत 20 लाख रुपये की मोटी रकम बैंक खाते में आ जाने के बावजूद महिला ने अपना आपराधिक मुकदमा वापस लेने से साफ इनकार कर दिया। हद तो तब हो गई जब साल 2018 में आरोप तय होने के बाद से लेकर अब तक, न तो वह महिला खुद और न ही उसके परिवार का कोई भी सदस्य अदालत में गवाही दर्ज कराने के लिए कभी उपस्थित हुआ।
वे सिर्फ केस की तारीखें बढ़वाकर पति के परिवार को तंग कर रहे थे। राजस्थान हाई कोर्ट ने मामले की इन सभी अजीबोगरीब परिस्थितियों और महिला के अड़ियल रवैये को देखते हुए अपना कड़ा रुख अख्तियार किया। अदालत ने समय बर्बाद न करते हुए पीड़ित पूर्व पति और उसके सीधे-साधे रिश्तेदारों के खिलाफ सालों से लंबित पड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को तुरंत प्रभाव से पूरी तरह निरस्त (खारिज) कर दिया।



