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Pradeep Rawat Death: क्या ब्लड कैंसर दोबारा होने से बचा जा सकता है? जानें इससे जुड़ी जरूरी बातें

फिल्म ‘गजनी’ में विलेन का रोल निभाने वाले प्रदीप रावत ने 74 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया. उनकी मौत का कारण ब्लड कैंसर बताया जा रहा है. एक बार वे इस बीमारी से उबर चुके थे लेकिन दोबारा होने की वजह से उनका निधन हो गया. ब्लड कैंसर के मामले में बहुत कम मरीज इस गंभीर बीमारी को मात देकर अपनी जिंदगी बचा पाते हैं. पर सवाल रहता है कि अगर ये दोबारा हो जाए तो क्या बचा जा सकता है.

Pradeep Rawat Death: क्या ब्लड कैंसर दोबारा होने से बचा जा सकता है? जानें इससे जुड़ी जरूरी बातें

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इलाज के बाद भी कभी कभी शरीर में कैंसर की बहुत कम संख्या में कोशिकाएं बच जाती हैं. ये कोशिकाएं इतनी कम होती हैं कि सामान्य टेस्ट में दिखाई भी नहीं देतीं. समय के साथ अगर ये फिर से बढ़ने लगें, तो बीमारी वापस आ सकती है.

एक्सपर्ट ने क्या कहा?

डॉक्टर मनीष साहनी, कंसल्टेंट कैंसर सर्जन, कैलाश दीपक हॉस्पिटल का कहना है कि इसे पूरी तरह रोकने का कोई पक्का तरीका अभी मौजूद नहीं है. हालांकि, बीमारी के वापस आने यानी रिलैप्स के खतरे को कम करने और अगर ऐसा हो भी जाए तो उसे जल्दी पकड़ने के लिए कई जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं.

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि हर ब्लड कैंसर एक जैसा नहीं होता. ल्यूकेमिया, लिंफोमा और मल्टीपल मायलोमा, इन सभी का व्यवहार और इलाज अलग होता है. इसलिए किसी एक मरीज का अनुभव दूसरे जैसा हो, यह जरूरी नहीं है. यही वजह है कि इलाज पूरा होने के बाद भी नियमित फॉलो अप उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितना खुद इलाज.

इन विजिट्स के दौरान ब्लड टेस्ट, बोन मैरो टेस्ट या जरूरत के अनुसार पूरे शरीर का PETCT स्कैन किए जाते हैं ताकि अगर बीमारी वापस आने के शुरुआती संकेत हों, तो उन्हें समय रहते पकड़ लिया जाए.

ऐसा दिया जाता है ट्रीटमेंट

एक्सपर्ट ने कहा कई मरीजों को मेंटेनेंस थेरेपी भी दी जाती है. इसका मतलब है कि इलाज खत्म होने के बाद भी कुछ समय तक दवाइयां जारी रखी जाती हैं ताकि कैंसर की बची हुई कोशिकाओं को बढ़ने का मौका न मिले. कुछ मरीजों में स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की सलाह भी दी जाती है, खासकर तब जब रिलैप्स का खतरा ज्यादा हो या बीमारी दोबारा लौट आई हो. यह इलाज स्वस्थ रक्त बनाने वाली स्टेम सेल्स की मदद से बोन मैरो को दोबारा तैयार करने का काम करता है.

आज अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में ब्लड कैंसर के इलाज में काफी प्रगति हुई है. टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और CAR T सेल थेरेपी जैसी नई तकनीकों ने कई मरीजों के लिए बेहतर और लंबे समय तक चलने वाले परिणाम दिए हैं. इसलिए अगर किसी मरीज में बीमारी दोबारा भी आती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि इलाज के विकल्प खत्म हो गए हैं.

ऐसा रखना चाहिए लाइफस्टाइल

डॉक्टर कहती हैं कि जहां तक लाइफस्टाइल की बात है, स्वस्थ खाना, नियमित शारीरिक गतिविधि, धूम्रपान से दूरी, शराब का सीमित सेवन और संक्रमणों से बचाव शरीर को बेहतर रिकवरी में मदद करते हैं. हालांकि, केवल अच्छी जीवनशैली अपनाने से रिलैप्स को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता.

इसलिए दवाइयां समय पर लेना, डॉक्टर की सलाह का पालन करना और किसी भी नए लक्षण जैसे बार बार बुखार, बिना वजह वजन घटना, लगातार थकान या लिम्फ नोड्स में सूजन दिखे तो उसे नजरअंदाज न करना सबसे जरूरी बात है. जितनी जल्दी बदलाव पकड़े जाते हैं, उतनी ही जल्दी इलाज शुरू किया जा सकता है और परिणाम बेहतर होने की संभावना बढ़ जाती है.

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