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​PTM सिर्फ रिपोर्ट कार्ड की बैठक नहीं, बच्चे के बेहतर भविष्य की साझेदारी है

​PTM सिर्फ रिपोर्ट कार्ड की बैठक नहीं, बच्चे के बेहतर भविष्य की साझेदारी है

लखनऊः शिक्षा केवल पुस्तकों, परीक्षाओं और अंकों तक सीमित प्रक्रिया नहीं है, बल्कि बच्चे के व्यक्तित्व का निर्माण घर और विद्यालय दोनों के संयुक्त प्रयास से होता है। शिक्षक बच्चे को ज्ञान, दिशा, अनुशासन, सामाजिक व्यवहार और जीवनकौशल देता है, वहीं परिवार उसे संस्कार, भावनात्मक सुरक्षा, प्रोत्साहन और जीवनमूल्य देता है। इन दोनों के बीच निरंतर संवाद और सहयोग बना रहे, तो बच्चे की सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनती है। इसी संवाद का सशक्त माध्यम है अभिभावकशिक्षक बैठक ।

क्या है पीटीएम

पीटीएम को केवल फीस जमा करने, औपचारिक भेंट, परीक्षापरिणाम बताने या शिकायत सुनाने का अवसर मानना इसके वास्तविक उद्देश्य को सीमित करना है। यह विद्यालय, शिक्षक और अभिभावक को एक साझा मंच देती है, जहां बच्चे की शैक्षिक प्रगति, व्यवहार, रुचियों, प्रतिभाओं, कठिनाइयों और भावनात्मक आवश्यकताओं पर मिलकर विचार किया जा सकता है। इसका उद्देश्य उपलब्धियों या कमियों को बताने के साथ बच्चे की चुनौतियों को समझना और समाधान खोजना है।

पीटीएम की आवश्यकता

नई शिक्षा नीति2020 में रटने के बजाय समझ, चिंतन, रचनात्मकता, समस्या समाधान और अनुभव से सीखने को महत्व दिया गया है। इसलिए पीटीएम में इन विषयों पर भी चर्चा होनी चाहिए। हर बच्चा अलग होता है। उसकी सीखने की गति, रुचि, क्षमता, स्वभाव और समस्याएं अलग हो सकती हैं। कई बार बच्चा विद्यालय में सहज दिखता है, लेकिन घर पर पढ़ाई में कठिनाई अनुभव करता है। इसके विपरीत, कुछ बच्चे घर में सक्रिय होते हैं, किंतु कक्षा में संकोची या कम भागीदारी वाले हो सकते हैं। शिक्षक और अभिभावक अपने अनुभव साझा करके बच्चे की वास्तविक स्थिति को बेहतर समझ सकते हैं। पीटीएम से अभिभावकों को यह जानने का अवसर मिलता है कि बच्चा कक्षा में कैसा प्रदर्शन कर रहा है।

सार्थक पीटीएम का स्वरूप

सार्थक पीटीएम संवाद, सहयोग और समाधान पर आधारित होती है। बैठक केवल अंकों और कमियों तक सीमित न रहे। शिक्षक पहले बच्चे की सकारात्मक उपलब्धियों और विशेषताओं पर चर्चा करें तथा सुधार वाले क्षेत्रों में स्पष्ट और विनम्र सुझाव दें। दूसरे बच्चों से तुलना करने के बजाय बच्चे की अपनी पिछली उपलब्धियों से तुलना अधिक उपयोगी है। अभिभावकों को भी बिना संकोच बच्चे की कठिनाइयों, रुचियों और घर की परिस्थितियों के बारे में बताने का अवसर मिलना चाहिए। एकदूसरे को दोष देने के बजाय समाधान खोजने की भावना हो, तो पीटीएम प्रभावी बनती है।

बना रहे संतुलन

स्कूल में बच्चा किस तरह के तनाव या दबाव से गुजर रहा है, इससे मातापिता प्रायः अनभिज्ञ रहते हैं। पीटीएम में शिक्षक के साथ तय नियम, जैसे स्क्रीन टाइम कम करना, पढ़ाई का समय तय करना, खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए समय देना, घर पर भी अनुशासन से लागू किए जाने चाहिए। जब बच्चे को दिखता है कि मातापिता और शिक्षक एक जैसी बात कर रहे हैं, तो वह नियमों का पालन गंभीरता से करता है। पीटीएम की उपेक्षा भी उचित नहीं है। यदि अभिभावक निश्चित दिवस पर न जा सकें,तो किसी अन्य कार्य दिवस में समय लेकर आवश्यक वार्ता कर सकते हैं।

विद्यालय और अभिभावक की भूमिका

विद्यालय और शिक्षक की भूमिका केवल कमियां बताने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें घर पर तनावमुक्त अध्ययन वातावरण, खेल, रचनात्मक गतिविधियों और पर्याप्त विश्राम, प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता, डिजिटल उपकरणों के संतुलित उपयोग तथा छोटी उपलब्धियों की सराहना जैसे व्यावहारिक सुझाव देने चाहिए। गलती पर डांटने के बजाय उससे सीखने का अवसर, पुस्तकपठन, पर्याप्त नींद, पोषणयुक्त भोजन और मानसिक शांति पर भी ध्यान जरूरी है।

अभिभावकों को समझना चाहिए कि शिक्षक उनके विरोधी नहीं, बल्कि बच्चे के विकास में सहयोगी हैं। पीटीएम शिकायत कहनेसुनने की नहीं, समाधान खोजने की बैठक है। अभिभावक बच्चे के व्यवहार, रुचि, अध्ययन की आदत और विशेष प्रतिभाओं की जानकारी शिक्षक को दें। किसी समस्या पर तुरंत रक्षात्मक होने के बजाय उसे मिलकर सुलझाएं। बच्चे के साथ अभद्रता, अशिष्टता या उत्पीड़न की शिकायत हो, तो कक्षाशिक्षक या शिक्षा प्रभारी को तुरंत जानकारी दें। यदि बच्चा किसी विषय से डरता है, विद्यालय आने में झिझकता है या घर में कोई बड़ा भावनात्मक बदलाव हुआ है, तो शिक्षक को बताना उपयोगी है।

पीटीएम की उपलब्धियां

सार्थक पीटीएम से शैक्षिक कमजोरियों की समय रहते पहचान होती है, प्रतिभा और रुचियों को विकसित करने के अवसर मिलते हैं तथा विद्यालय और परिवार के बीच विश्वास बढ़ता है। बच्चे को यह संदेश मिलता है कि मातापिता और शिक्षक उसके भविष्य को लेकर चिंतित और प्रतिबद्ध हैं। इससे आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित हो सकता है।

पीटीएम को ‘शिकायत की बैठक’ से ‘साझेदारी की बैठक’ बनाना आवश्यक है। सवाल यह हो कि बच्चे को बेहतर बनाने के लिए हम मिलकर क्या कर सकते हैं?

अंततः बच्चे की शिक्षा एक त्रिकोणीय साझेदारी है बच्चा, परिवार और विद्यालय। इन तीनों के बीच जितना बेहतर संवाद होगा, शिक्षा उतनी ही प्रभावी होगी। पीटीएम इसी साझेदारी को मजबूत करने का अवसर है। यदि शिक्षक ज्ञान और दिशा दें, मातापिता विश्वास और सहयोग दें तथा बच्चा सीखने के लिए उत्साह दिखाए, तो शिक्षा अच्छे, संवेदनशील, आत्मनिर्भर और जिम्मेदार नागरिक के निर्माण की प्रक्रिया बन सकती है। इसलिए प्रत्येक पीटीएम का मूल संदेश होना चाहिए “बच्चे की सफलता हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।”

पीटीएम में पूछें सही प्रश्न

अभिभावक बैठक से पहले बच्चे से बात करके संभावित प्रश्नों की सूची बना सकते हैं। शिक्षक से पूछें कि बच्चे के सीखने का तरीका क्या है, वह कक्षा में उदास या तनाव में तो नहीं रहता, खेलकूद व पाठ्येतर गतिविधियों में भाग लेता है या नहीं। “नंबर कम क्यों आए?” के बजाय “घर पर हम उसके सीखने में कैसे मदद कर सकते हैं?” जैसे प्रश्न अधिक उपयोगी हैं। शिक्षक से असहमति हो, तो भी बातचीत सम्मानजनक और समाधानपरक होनी चाहिए।

गौरीशंकर वैश्य विनम्र, लखनऊ

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