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किसकी तस्वीर ने पढ़ाकू सुखदेव को क्रांतिकारी बनाया? बैग में किताबों के साथ पिस्तौल-कारतूस देख डर गई थीं मां

Shaheed Sukhdev Jayanti: अमर शहीद भगत सिंह के साथ हंसते हुए फांसी का फंदा चूमने वालों में शहीद सुखदेव और राजगुरु भी शामिल थे. सरदार भगत सिंह की वीरता और शहादत अविस्मरणीय है. वे आजाद की क्रांतिकारी धारा के मुकुट हैं. पर यह मुकुट उनके सिर पर जिन्होंने सजाया, उनका बलिदान भी किसी से कम नहीं है. आजादी के संघर्ष की क्रांतिकारी धारा और उसमें शहादत देने वाले क्रांतिकारी, इतिहासकारों की नजर से प्रायः उपेक्षित रहे हैं. सुखदेव भी उनमें एक हैं. 15 मई 1907 को जन्मे सुखदेव ने सिर्फ तीन साल की उम्र में पिता रामलाल थापर को खो दिया था. मां रल्ली देई और ताऊ चिन्त राम थापर ने परवरिश की.

किसकी तस्वीर ने पढ़ाकू सुखदेव को क्रांतिकारी बनाया? बैग में किताबों के साथ पिस्तौल-कारतूस देख डर गई थीं मां
किसकी तस्वीर ने पढ़ाकू सुखदेव को क्रांतिकारी बनाया? बैग में किताबों के साथ पिस्तौल-कारतूस देख डर गई थीं मां

ताऊ गांधी के सिपाही के तौर पर अहिंसक आंदोलन के रास्ते पर थे. सुखदेव उसी मंजिल की ओर क्रांतिकारी रास्ते पर चले और देश पर कुर्बान हो गए. जन्मदिन के मौके पर पढ़िए अमर शहीद सुखदेव की गाथा.

अदालत ने कहा सुखदेव का अपराध भगत सिंह से कम नहीं

7 अक्टूबर 1930 को लाहौर की अदालत में स्पेशल ट्रिब्यूनल के जज जी. सी.हिल्टन, अब्दुल कादिर और जे.के.टैप ने सांडर्स वध केस के फैसले में लिखा, “सुखदेव को धारा 121,302 व इसके साथ 109 और 120 बी के तहत दोषी करार दिया जाता है. अभियुक्त हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी की पंजाब शाखा का नेता था और पंजाब में इस पार्टी के कारण अनेक हिंसक घटनाएं हुईं. मिस्टर स्कॉट की हत्या के लिए सुखदेव प्रेरणास्त्रोत था, जिसके फलस्वरूप उनकी हत्या हुई. इसके अतिरिक्त अभियुक्त बमों को बनाने और पार्टी के लिए सक्रिय सदस्य बनाने के लिए भाग लेता रहा. उसका अपराध भगत सिंह के अपराध से किसी तरह भी कम नहीं है और भगत सिंह वह एक साधन था, जिसके माध्यम से सुखदेव ने अपनी योजना पूरी की. सुखदेव को भी गले में फंदा डालकर मौत की सजा दी जाती है.

झांसी की रानी.

बचपन में सिर्फ झांसी की रानी की तस्वीर की तलाश

सुखदेव के सिर से पिता का साया सिर्फ तीन साल की उम्र में उठ गया था. छोटे भाई मथरा दास थापर तो मां के गर्भ में थे, जब पिता की 1910 में मृत्यु हुई. बाद में उन्हीं मथरादास ने अपनी किताब “मेरे भाई शहीद सुखदेव” में उनकी जीवन गाथा को शब्दों में पिरोया. सुखदेव को आगे अपना जीवन मातृभूमि के लिए न्योछावर करना है, इसकी तैयारी उन्होंने बचपन से ही शुरू कर दी थी.

मथरादास ने लिखा, “दिवाली पर हम सभी बच्चों को पैसे मिलते. हम आतिशबाजी और मिठाइयां खरीदते. बाजार से तरहतरह की तस्वीरें भी ले आते. परन्तु सुखदेव को सिर्फ झांसी की रानी की तस्वीर पसंद थी. उसके लिए सारा बाजार छान मारते. नहीं मिलती तो खाली हाथ लौट आते. जब कभी मिल जाती तो चेहरा दमक जाता. मां को तस्वीर दिखा उत्साह से कहते, “मां देख यह लक्ष्मीबाई है. झांसी की रानी. इसने अंग्रेजों से लोहा लिया था. कितनी बहादुर थी यह! पीठ पर बच्चा बंधा है. एक हाथ में घोड़े की लगाम. दूसरे में तलवार. ” मां कुछ काम में लगी रहतीं तो कह देती थीं कि चल मुझे काम करने दे. सुखदेव का चेहरा सख्त हो जाता. आंखों में सुर्खी आ जाती और दृढ़ता से कहते, ” मैं भी ऐसा ही बनूंगा मां! “

मथरादास की किताब “मेरे भाई शहीद सुखदेव” में प्रकाशित सुखदेव और उनकी मां रल्लीदेई थापर की तस्वीर.

कॉलेज में पहुंचते ही क्रांतिकारियों से जुड़ाव

1922 में लायलपुर से हाईस्कूल करने के बाद सुखदेव आगे की पढ़ाई के लिए लाहौर पहुंचे. आर्यसमाजी ताऊ उन्हें डी.ए.वी.कॉलेज में प्रवेश दिलाना चाहते थे. लेकिन सुखदेव की पसंद लाला लाजपत राय द्वारा संस्थापित नेशनल कॉलेज था, जिसका एक मात्र उद्देश्य राष्ट्रीय आंदोलन के लिए नई पीढ़ी को तैयार करना था.

यहां सरदार भगत सिंह साथ थे. वे दोनों क्रांतिकारी दल से जुड़ चुके थे. मथरादास ने लिखा कि एक बार सुखदेव कैनवस का एक वजनी बैग लायलपुर लाए. वापसी में भूल गए. मां ने उसे सुरक्षित रखने के लिए उठाया. वजन ज्यादा लगा. खोला तो मोटी किताबों के साथ उसमें एक पिस्तौल और कुछ कारतूस मिले. घबरा गईं. लेकिन ताऊ ने चुप रहने को कहा. उन्हें अहसास हो गया था कि सुखदेव जिस रास्ते पर चल पड़ा है, उससे वापसी मुमकिन नहीं है.

सुखदेव की आलमारी में विश्वक्रांति, राजनीति और इतिहास की तमाम किताबें सजी थीं.

भगत सिंह की तर्ज पर खूब पढ़ाकू

1925 में सुखदेव के छोटे भाई मथरादास टेक्निकल पढ़ाई के लिए लाहौर पहुंचे. सुखदेव हॉस्टल छोड़कर छोटे भाई के साथ रहने के लिए किराए के एक मकान में आ गए. यहां मथरादास ने पाया कि सुखदेव की आलमारी में विश्वक्रांति, राजनीति और इतिहास की तमाम किताबें सजी हैं. द्वारका दास, पंजाब और कॉलेज लाइब्रेरी की अनेक किताबें भी कमरे में पड़ी रहतीं. ये सब किताबें वे पढ़ते रहते थे. फ्रांस, इटली और रूस की क्रांतियों और विभिन्न देशों के स्वतंत्रता का गहन अध्ययन और उसे लेकर साथियों से वार्तालाप निरंतर चलता रहता था. कोर्स की किताबें तो भूलकर उनके हाथ में दिखती थीं. यहां सुखदेव और भगत सिंह अराजकतावाद पर बहस किया करते थे.

उन दिनों भगत सिंह ने द्वारका दास लाइब्रेरी से प्राप्त किताब “अनारकिज्म एंड अदर एसेज” पढ़ी थी. इस किताब पर भगत सिंह और सुखदेव महीनों तक मंथन करते रहे. प्रसिद्ध क्रांतिकारी शिव वर्मा ने लिखा है, “भगत सिंह और सुखदेव को छोड़कर अन्य किसी साथी ने समाजवाद पर इतना पढ़ा और मनन नहीं किया था. उनका ज्ञान हमारी तुलना में कहीं अधिक था.”

फांसी के दिन 23 तारीख को तो सुखदेव की परिवार के किसी सदस्य से भेंट नहीं हो सकी थी.

हिंसक रास्ते के पीछे भी दर्शन और विचार

क्रांतिकारियों के हिंसक रास्ते के पीछे भी दर्शन और विचार थे. लाहौर के बोस्टर्ल जेल से सुखदेव ने एक पत्र में लिखा कि हमारे एक्शंस तीन प्रकार के हैं प्रोपेगेंडा,मनी, स्पेशल. प्रोपेगेंडा का मतलब समझिए. दरअसल ऐसे एक्शंस जन भावनाओं के अनुकूल होते हैं. उदाहरण के लिए सांडर्स मर्डर को लो. लाला लाजपत राय पर लाठियां पड़ते देख हमने महसूस किया कि देश में बहुत हलचल है. सरकार के रवैए ने इसमें तेल का काम किया. जनता का ध्यान क्रांतिकारियों की ओर खींचने के लिए एक्शन के लिए हमें यह माकूल मौका लगा. हमारा विचार है कि हमारे एक्शंस जनता की भावनाओं के अनुकूल और सरकार द्वारा पैदा परेशानियों के उत्तर में होने चाहिए. ताकि जनता हमारे प्रति सहानुभूति रखते हुए सहयोग के लिए तत्पर हो जाए. हमारा प्रयास रहा है कि क्रांतिकारी आदर्शों को जनता के बीच फैलाया जाए और जनता को जागृत किया जाए.

सुखदेव ने असेंबली बम कांड में भगत सिंह को क्यों शामिल कराया ?

8 अप्रैल 1929 के मशहूर असेंबली बम कांड जिसमें भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने भागने की जगह अपनी गिरफ्तारियां दीं, उस एक्शन में भगत सिंह को शामिल कराने में सुखदेव की निर्णायक भूमिका थी. चंद्रशेखर आजाद और अन्य साथी नहीं चाहते थे कि भगत सिंह इस एक्शन में हिस्सा लें. वजह साफ थी. सांडर्स हत्याकांड में पुलिस को भगत सिंह की तलाश थी. एक बार गिरफ्त में आ जाने के बाद उनकी जेल से जिंदा वापसी की गुंजाइश नहीं थी.

सुखदेव का कहना था कि भगत सिंह अकेले व्यक्ति हैं, जो दल के उद्देश्यों को मजबूती के साथ जनता के सामने रख सकते हैं. फिर केंद्रीय समिति की बैठक में भगत सिंह ने एक्शन में शामिल होने की जिद पकड़ ली. क्रांतिकारी शिव वर्मा ने “संस्मृतियों” में लिखा, “सुखदेव में व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज्यादा भगत सिंह के लिए ममता थी. प्यार नाम की जो पूंजी उनके पास थी, वह उन्होंने भगत सिंह को ही सौंपी थी. लेकिन समय आने पर आदर्शों के लिए अपने सबसे प्यारे दोस्त को मौत के मुंह में भेजने में उन्होंने संकोच नहीं किया. क्रांति के रास्ते प्यार और दोस्ती कैसे आड़े आ सकती थी?”

मौत पास, फिर भी बेफिक्र

लाहौर षडयंत्र केस के नाम से चर्चित सांडर्स हत्याकांड में अभियुक्त के तौर पर बचाव के मामले में सुखदेव पूरी तौर पर उदासीन रहे. स्पेशल ट्रिब्यूनल ने उनसे पूछा कि क्या सरकारी खर्च पर उन्हें वकील दिया जाए? इनकार करते हुए सुखदेव ने कहा था कि वे इस अदालत को ही मान्यता नहीं देते. क्रांतिकारी साथी शिव वर्मा के अनुसार सुखदेव की बचाव में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वे शत्रु अदालत से न्याय की उम्मीद नादानी मानते थे. अदालत के मंच का उपयोग वे केवल क्रांतिकारी आदर्शों के प्रचार के लिए करने में भरोसा रखते थे. छोटे भाई मथरादास ने उन्हें मुकदमे के दौरान अदालत के कटघरे में हमेशा खामोश किसी किताब में डूबा पाया. वायदा माफ गवाहों जयगोपाल, हंसराज और फणींद्र नाथ घोष जब अपनी गवाही में उन पर आक्षेप कर रहे थे, वे तब भी मुस्कुराते रहे.

कभी भी न बचाव में सफाई दी और न किसी गवाह से जिरह की. वे आश्वस्त थे कि सरकार उन्हें नहीं छोड़ेगी. ट्रायल के दौरान एक मौके पर सुखदेव ने कहा था, ” हमें डर किस बात का है? कह क्यों नहीं देते कि हमने ऐसा किया है. कब तक चलेगा यह सब ? एक दिन फांसी होकर रहेगी. तय है कि उसमें एक नाम मेरा होगा. फांसी के दिन 23 तारीख को तो सुखदेव की परिवार के किसी सदस्य से भेंट नहीं हो सकी थी. दो मार्च और इसी महीने के मध्य की अपनी आखिरी दो मुलाकातों की यादों को छोटे भाई मथरादास ने शब्द दिए हैं, ” मैंने तीनों को देखा था. वे प्रसन्नचित थे. सुखदेव भी हंस हंस कर बाते कर रहे थे. हम द्रवित और उत्तेजित थे. लेकिन सुखदेव बेफिक्र थे जैसे फांसी का फंदा उनके लिए खेल हो!

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