आप तो कांग्रेस के कार्यकर्ता रहे हैं. फिर कांग्रेस के अधीन ही स्वयंसेवक कमान का गठन क्यों नहीं किया? 26 दिसंबर 1934 को महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार से यह सवाल किया था. उनका उत्तर था,” कांग्रेस का गठन मूल रूप से एक राजनीतिक लक्ष्य प्राप्ति के लिए किया गया है. उसे अपने कार्यक्रमों के लिए ऐसे अवैतनिक कार्यकर्ताओं की जरूरत रहती है, जो बैठकोंसम्मेलनों में कुर्सियांबेंचें लगाने का कार्य करें.”

इस मुलाकात के एक दिन पहले महात्मा गांधी ने संघ के वर्धा शिविर में डेढ़ घंटे का बिताया था और वहां की व्यवस्था और अनुशासन से प्रभावित होकर डॉक्टर हेडगेवार से भेंट की उत्सुकता व्यक्त की थी. पढ़िए डॉक्टर हेडगेवार की पुण्यतिथि के अवसर पर गांधी जी और संघ के संपर्क से जुड़े कुछ प्रसंग.
जब महात्मा गांधी संघ शिविर में पहुंचे
उन दिनों महात्मा गांधी वर्धा के निकट सेवाग्राम में रुके हुए थे. उनके आवास के ठीक सामने संघ का शिविर लगा हुआ था, जिसमें पंद्रह सौ स्वयंसेवक सम्मिलित थे. शिविर की गतिविधियों ने महात्मा गांधी के मन में उत्सुकता हुई. उन्होंने सचिव महादेव देसाई से इसे व्यक्त किया. देसाई ने संघ के अप्पा जी जोशी को पत्र लिखा. तुरंत ही अप्पा जी महात्मा गांधी से मिले और अपनी सुविधा से शिविर में आने का निमंत्रण दिया.
महात्मा गांधी.
महात्मा गांधी का मौन दिवस था. उन्होंने कागज के एक टुकड़े पर सहमति में लिखा, ” मैं कल सुबह आऊंगा और वहां डेढ़ घंटे बिताऊंगा.” अगली सुबह 25 दिसंबर 1934 को निश्चित समय पर वे शिविर में पहुंचे. हो.वे.शेषाद्रि के हवाले से अरुण आनंद ने अपनी किताब ” 5 सरसंघचालक ” में लिखा है कि महात्मा गांधी के साथ महादेव देसाई, मीरा बेन और कुछ अन्य लोग भी थे.
अनुशासनसुव्यवस्था से गांधी हुए प्रसन्न
शिविर में महात्मा गांधी के प्रवेश करते ही स्वयंसेवकों ने उन्हें सामूहिक प्रणाम किया. सुसज्जित और अनुशासित शिविर की व्यवस्था ने गांधी जी को काफी प्रभावित किया. अप्पा जी जोशी की पीठ थपथपाते हुए उन्होंने कहा था, “मैं बहुत खुश हूं. ऐसा दृश्य देश में पहले कहीं नहीं देखा था.” पंद्रह सौ लोगों का एक ही रसोई में बिना किसी शोर शराबे के बीच भोजन बनना और प्रत्येक के लिए सिर्फ एक रुपए की लागत तथा स्वयंसेवको द्वारा स्वयं खर्च उठाने की सूचनाओं ने महात्मा गांधी को चौंकाया था.
बीमार स्वयंसेवकों के शिविर में भी वे गए. बिना भेदभाव और परस्पर स्नेह भाव से साथ रह रहे इन स्वयंसेवकों से महात्मा गांधी ने कई सवाल किए. उत्तर एक ही प्रकार का था कि संघ में आपस में कोई अलगाव या भेदभाव नहीं है.
डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार.
संघ में ऊंचनीच और छुआछूत का स्थान नहीं
स्वयंसेवकों ने महात्मा गांधी को बताया था कि हमें अपने साथियों की जाति नहीं पता और हम इसे जानना भी नहीं चाहते. यहां कोई अछूत नहीं है. हमारे लिए यह काफी है कि हम सब हिंदू हैं. चकित महात्मा गांधी ने अप्पा जी से कहा था, यह लगभग असंभव लगता है कि हम अपने समाज से छुआछूत की बीमारी खत्म कर दें. संघ इसे कैसे मुमकिन कर पा रहा है?
अप्पा जी ने महात्मा गांधी से कहा था, ” ऊंचनीच, छूतअछूत के भाव केवल हिंदुओं में एकता उत्पन्न करके समाप्त किए जा सकते हैं. तभी केवल कहने के लिए नहीं बल्कि सच्चे व्यवहार में भाईचारा नज़र आएगा. संघ यह कर पा रहा है, इसका श्रेय डॉक्टर हेडगेवार को है. सभा का समय हो जाने पर महात्मा गांधी ने अप्पा जी के साथ खड़े होकर संघ की परम्परा के अनुसार ध्वज को प्रणाम किया था. शिविर के भंडार के निरीक्षण के समय महात्मा गांधी का ध्यान डॉक्टर हेडगेवार के चित्र की ओर गया था. गांधी जी कहा था कि वे उनसे मिलना चाहेंगे.
गांधी का सवाल, अलग संस्था क्यों बनाई?
इसी शिविर के निरीक्षण के लिए डॉक्टर हेडगेवार को अगले दिन डॉक्टर हेडगेवार को वर्धा पहुंचना था. 26 दिसंबर 1934 की शाम डॉक्टर हेडगेवार महात्मा गांधी से भेंट करने गए. अप्पा जी जोशी और भोपाटकर उनके साथ थे. एक घंटे से अधिक समय तक उनकी महात्मा गांधी से वार्ता हुई. अरुण आनंद ने अपनी किताब में इस बातचीत के बारे में लिखा, “डॉक्टर जी, आपकी संस्था प्रशंसनीय है. मुझे इस तथ्य के प्रति जानकारी है कि आप कई वर्षों तक कांग्रेस के कार्यकर्ता रहे हैं. ऐसा होते हुए आपने एक लोकप्रिय संस्था जैसे कांग्रेस के ही अंतर्गत क्यों नहीं एक स्वयंसेवक कमान का गठन किया? क्यों आपने एक पृथक संस्था बनाई?
डॉक्टर हेडगेवार का उत्तर था, “यह सच है कि मैंने कांग्रेस में कार्य किया. वर्ष 1920 के अधिवेशन के समय स्वयंसेवक दल का सचिव भी रहा. मेरे मित्र डॉक्टर परांजपे अध्यक्ष थे. हम दोनों ने मिलकर कांग्रेस के भीतर एक स्वयंसेवक कमान बनाने का प्रयत्न किया. लेकिन हमारे प्रयत्न सफल नहीं हो सके. इसलिए एक स्वतंत्र संगठन बनाना पड़ा.”
हेडगेवार ने कहा वहां कुर्सीबेंच लगाने वालों की जरूरत !
महात्मा गांधी ने असफलता की वजह जाननी चाही थी. क्या धन के अभाव के कारण? डॉक्टर हेडगेवार का उत्तर था, ” नहीं नहीं पैसों की कोई कमी नहीं थी. पैसा अच्छा मददगार हो सकता है. परन्तु सिर्फ पैसे से सब काम नहीं हो सकते. हमें जो समस्या थी, वह पैसों की नहीं. मनोवृत्तियों की थी.”
महात्मा गांधी तह में जाना चाहते थे. जवाबी सवाल करते हुए उन्होंने पूछा था कि क्या कांग्रेस में सहृदय व्यक्तियों की कमी है अथवा हैं ही नहीं? डॉक्टर हेडगेवार ने कहा था कि वहां समर्थ लोग हैं लेकिन विवाद रवैए को लेकर है. कांग्रेस का गठन मूल रूप से राजनीतिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किया गया है. उसके कार्यक्रमों के लिए ऐसे अवैतनिक कार्यकर्ताओं की तलाश रहती है जो बैठकोंसम्मेलनों में कुर्सियां और बेंचें लगाने का काम करें. राष्ट्र की समस्याओं के निराकरण के लिए डॉक्टर हेडगेवार ने ऐसे बड़े और अनुशासित संगठन की आवश्यकता बताई थी, जिसमें स्वयंसेवक किसी के कहने से ही नहीं अपितु देश सेवा के लिए आगे आएं.
संघ के खर्च कैसे जुटते हैं ?
संघ के खर्चों की व्यवस्था को लेकर महात्मा गांधी ने अपनी जिज्ञासा डॉक्टर हेडगेवार के सामने भी व्यक्त की थी. यह सवाल एक दिन पहले वे संघ के शिविर में भी कर चुके थे. डॉक्टर हेडगेवार का उत्तर भी वही था, “स्वयंसेवक खुद ही यह भार उठाते हैं. इनमें से प्रत्येक का योगदान गुरुदक्षिणा के रूप में होता है. महात्मा गांधी का अगला सवाल था, ” ऐसा प्रतीत होता है कि आपका सारा समय संघ के कार्य में लग जाता है तो अपना चिकित्सा व्यवसाय कैसे कर पाते हैं ? उत्तर था कि मैंने चिकित्सा को अपनी आजीविका नहीं बनाया है. तो फिर अपने परिवार को कैसे चलाते हैं ? उत्तर था मैंने विवाह नहीं किया है.
महात्मा गांधी चौंके थे. कहा, “अच्छा आप विवाहित नहीं हैं. बहुत अच्छा. इससे पता चलता है कि कैसे इतने कम समय में आपने महत्वपूर्ण सफलता अर्जित की है.” डॉक्टर हेडगेवार ने इस उम्मीद के साथ विदा ली थी कि महात्मा गांधी के आशीर्वाद से संघ के प्रयत्न सफल होंगे.
महामना की धन संग्रह की पेशकश ठुकराई
संघ के खर्चों की व्यवस्था को लेकर पंडित मदन मोहन मालवीय ने भी डॉक्टर हेडगेवार से प्रश्न किया था. नागपुर की यात्रा में संघ के कार्य से प्रभावित महामना ने डॉक्टर हेडगेवार से कहा था, ” लोग मुझे शाही भिखारी कहते हैं. अगर आप सहमत हों तो मुझे आपके लिए भी धन एकत्र करने में प्रसन्नता होगी. विनम्रता से इस पेशकश को अस्वीकार करते हुए डॉक्टर हेडगेवार ने उन जैसे बुजुर्ग के आशीर्वाद को पर्याप्त बताया था. उत्तर से प्रभावित महामना की प्रतिक्रिया थी, “
कई संस्थाएं पहले धन की बात करती हैं. फिर लोगों की बात करती हैं. आप ठीक उनके विपरीत हैं. आगे से जहां भी जाऊंगा, आपकी इस खूबी के बारे में लोगों को बताऊंगा.” असलियत में डॉक्टर हेडगेवार संघ को किसी आर्थिक सहायता के दबावों से मुक्त रखना चाहते थे. संघ कार्य की धन की जरूरतों की पूर्ति के लिए 1928 में उन्होंने भगवा ध्वज के समक्ष स्वयंसेवकों द्वारा गुरुदक्षिणा की परम्परा प्रारंभ की. पहली गुरु दक्षिणा में कुल चौरासी रुपए की राशि आई थी. आज भी संघ का वित्त पोषण गुरुदक्षिणा के धन से ही हो रहा है.



